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शुक्रवार, 21 जून 2013

कांग्रेस ने ही भारत में “नक्षलवाद” फैलाया!


भारत को आझादी मिली, उसमे हमे सत्ता और संपत्ती मिली. उसका राष्ट्रीयकरण करणे के बजाए तत्कालीन कान्ग्रेसी नेताओ ने उसका निजीकरण किया. हिंदूधर्म के वर्ण व्यवस्था से जो लोग व...िषमता के जालमे फंस चुके थे, उन्हें बहार निकलने के बजाए भारतीय संविधान के "धारा- ३१" के जरिए कायम, मजबूती दी गयी. वर्णवादी अर्थव्यवस्था को भारत में गधा गया, जिसे बाबासाहब आंबेडकर नहीं चाहते थे, उन्होंने उसका विरोध भी किया, पर उनके साथ हमेशा अल्पमत रहा था. जिस धारा को बाबासाहब ने काली धारा के रूप में नवाजा था वह "धारा- ३१" ही थी. यह धारा संविधान में होने से गरीब और आमिर ऐसे दो हिस्से भारत में बने. गरीबों को मजबूरन स्थिथि में लाया गया, नक्शलवाद के लिए गरीब भूमि ही फलने फूलने के लिए चाहिए थी जिसे कांग्रेस ने टायर की थी. जिसका नतीजा १९६७ से अर्थात ४६ साल से भारत में नक्शलवाद गरीबों को ख़त्म कर रहा है. 

राजकीय नेताओं को जो कार्य संविधान के माध्यम से संभव नही वह कार्य उन्होंने नक्शलवादियों के जरिए पूरा करने का कार्य किया है. गरीब सिर्फ अनुयायी है, मगर उनके नेता तो उच्च जातियों के ही है, अम्बेडकरी विचारों से गरीबों को अलिप्त रखने के लिए नक्षलवाद का सहारा लिया गया, जो हिंसा का रास्ता है, जनतंत्र के लिए घातक है. भारत में गरीब केवल आदिवासी लोग ही नही है, जो हिंसा का रास्ता अपना चुके है, जनता से ज्यादा सर्कार जिम्मेदार है जो गरीबों को "एक व्यक्ति, एक मत" के साथ "एक व्यक्ति, एक मूल्य" अर्थात "आर्थिक जनतंत्र को लागु करने में आगे नयी आयीं. भारत के बहुतांश ८०% लोग बढ़ते हुए महंगाई के साथ कैसे क्या जंग लाध सकते है? 

मरता क्या नहीं करता? वह अपनी पे आया तो कुछ भी कर सकता है यह छातिसगढ़ के नक्शली हमले से साबित ही हो चूका, बिचारे कही निरपराध लोगों के जीवन को न्यौछावर होना पड़ा. नक्षलवाद के बिज कांग्रेस के गलत नीतियों के कारन भारत के भूमि में गिरे जिसका नतीजा बेकसूर भारतियों को भुगतना पढ़ रहा है. बाबासाहब आंबेडकर के आर्थिक विचारों की और नजर अंदाज करने का नतीजा ही भारत में नक्षलवाद फल फुल रहा है, इसके लिए कांग्रेस पार्टी सर्वथा जिम्मेवार है, नक्शलवाद ही नही तो आतंकवाद, बेकारी, कुपोषण, भ्रष्टाचार आदि राष्ट्रिय समश्याओं को निर्माण करने के लिए कांग्रेस की गलत निति ही जिम्मेदार है, उनके नीतिओं का मूल्यमापन करना चाहिए और गलत नीतियों को लागु करने के कारन उनपर मुकदमा चलन चाहिए.



सन १९६७ से भारत में नक्षलवाद फ़ैल रहा है, फिर भी कांग्रेस ने उनके साथ सही ढंग से नहीं निपटा उसका यह प्रतिफल है की भारत में हमारे ही देश के कुछ गरीब लोग हमारे ही जनतंत्र के दुश्मन बने है. नक्षलवाद यह आतंकवाद है, हमारे घर में जब हमारे बच्चे जब आतंकी होते है तब हम उनसे किस ढंग से पेश आते? ठीक उसी ढंग से किसी भी आतंकी लोगों से निपटा जा सकता है. पर हम हमारे ही बच्चों ने कुछ गलत कार्य किया तो उन्हें बन्दुक का दर बताकर उनसे नहीं निपटते. पर भारतीय सर्कार ने नक्शालियों के मांगों की ओर नजरंदाज करके बंदूकों के सहारे उसे मिठाने के जो कदम अख्तियार किये उससे देश में "पूंजीवाद" फैला और सामान्य गरीब और भी गरीब होते गया. जबतक गरीब लोग देश से नफरत के बजाय प्यार नहीं करेंगे तबतक देश का "राजकीय जनतंत्र" कभी भी सुरक्षित नहीं रह सकता. 

राजकीय जनतंत्र को कायम करने के लिए "राजकीय जनतंत्र" को शिग्र-ती-शिग्र लागु करने की जरुरत है. आर्थिक जनतंत्र ही नक्षलवाद को देश से समाप्त करने का जनतांत्रिक रास्ता है. खाजगी संपत्ति का मोह छोड़कर हमने अब "राष्ट्रीयकरण" को महत्त्व देना जरुरी है. देश में भूमि सुद्धर के नामपर खेती का निजीकरण करना कोई सही कार्य नहीं है. देश के सभी जमी, उद्धोग और बिमा का राष्ट्रीयकरण ही देश होटों का सही राष्ट है. अन्यथा देश में हमेशा निजी संपत्ति अधिक से अधिक बनाने के चक्कर में भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्षलवाद, गरीबी, भुकमरी, कुपोषण और बेरोजगार की समश्याए हमेशा सर्कार का पिछा करते रहेगी, और देश में सर्कार, देश तथा जनतंत्र के खिलाफ असंतोष बढ़ते जाएगा. यह सिर्फ गरीबों के ही अहितों में नही तो अमीरों के भी अहितों में रहेगा.

शुक्रवार, 14 जून 2013

जनतंत्र : आतंकवाद, नक्षलवाद और ब्राह्मणवाद

पिछले सदी में २ विश्व महायुद्ध हुए. काफी जानमाल का नुकसान हुआ. तानाशाही के खिलाफ विश्व के कही देश एक हुए, जिससे विश्व के काफी देश तानाशाही से मुक्त हुए, जहाँ पर जनतंत्र बहल किया गया. भारत में अंग्रेजों के गुलामी से आझादी पाने के लिए संघर्ष चालू थे, भारत आझाद हुआ और भारत में भी राजकीय जनतंत्र बहाल किया गया. 

डॉ बाबासाहब आंबेडकर महान बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में वे उभरकर आये. आझाद भारत का संविधान लिखने के लिए उनका भी काफी समय व्यतीत हुआ, २ साल, ११ माह और १८ दिन में भारत का संविधान कांग्रेस के नेताओं के बहुमतों से बना. मगर बाबासाहब के मतानुसार उसमे कुछ खामिया रही. वह राजकीय जनतंत्र बहाली के योग्य रहा पर आर्थिक जनतंत्र बहाल करने में यह संविधान असफल रहा. जिसके वजह से गरीब और अमिर ऐसे दो गुठों में जनता विभक्त हुयी. दोनों आपस में लड़ते रहे. अमिर अपने मुनाफे के लिए मजबूर गरीबों का शोषण लगातार करते रहा.


गरीब लोगों ने अपने विकास के लिए जातिगत आरक्षण को अपना हक समझकर स्वीकार किया पर उससे सभी गरीबों का विकाश नहीं हुआ. अभी भी भारत में गरीबों की हालात बहुत दयनीय है. कुछ लोगों ने आंबेडकर साहब के साथ बौद्ध धम्म को अपनाया, पर उससे भी गरीबी दूर करने के लिए कुछ मदत नहीं हुयी. कुछ लोग अपना जनतांत्रिक रास्ता भूल गए.

कुछ लोग जातियों के तानाशाही को अपने विकाश का रास्ता समझकर "बहुजन", व् "मुल्निवाशी" लहर में बह गए. कुछ लोगों को वह कम बिचमे ही छोड़ना पड़ा, क्योंकि उनमे तानाशाही हावी हुयी, संघटन में तानाशाही के काफी लोग शिकार हुए. और कुछ लोग मार्क्स वाद के माध्यम से अपनी गरीबी भगाने लगे, वे माओवादी नक्शली बने.

बहुजन लहर जातिवादी बनी तो कुछ लोग बगावती बने जिसमे से कुछ लोग माओवाद को बुद्ध धम्म समझ बैठे. हकीकत यह है की बुद्ध का रास्ता न जातिवाद का है और न मार्क्सवाद का. बाबासाहब ने जातिवाद और मार्क्सवाद से दूर रहने की हमेशा हिदायत दी थी.

बाबासाहब ने भाषण में स्पष्ट कहा था," विश्व के सामने, विशेषतः आशिया खंड में आज दो ही रास्ते बाकि है, एक बुद्ध का रास्ता और दूसरा मार्क्स का रास्ता. बुद्ध तत्वज्ञान का विश्व ने समय रहते हुए अंगीकार नही किया तो, कम्मुनिष्ट तत्वज्ञान का विजय होना तय है. बुद्ध का तत्वज्ञान यही विश्व को एकमेव आधार है. उसका प्रचार जितना ज्यादा होगा उतना ही विश्व युद्ध से वंचित रहेगा और शांति के करीब जायेगा."

मार्क्सवाद एक प्रकार की गरीबों की, मजदूरों की तानाशाही है. तानाशाही जनतंत्र के खिलाफ है, यह सोचकर बाबासाहब ने जनतंत्र के हिमायती बुद्ध को अपनाया, अपना गुरु कहा. तानाशाही फिर जाती की रहे या वर्ग की वह इंसानी हिंसा को बढ़ावा देती है, इसलिए बाबासाहब आंबेडकर ने हमेशा ब्राह्मणवाद और कम्मुनिष्ट विचारों का जमकर विरोध किया है.

जो लोग जनतंत्र में विश्वास करते है, उन्होंने जनतंत्र के रक्षा के लिए हमेशा आगे रहना चाहिए. काठमांडू, नेपाल के अपने प्रसिद्ध भाषण में भी उन्होंने "बुद्ध बनाम मार्क्स" साबित किया और भिक्षुओं को हिदायत दी थी की अगर विश्व में कम्मुनिस्ट (माओवाद) फैला तो उसके जिम्मेदार भिक्षु ही रहेंगे, ऐसा स्पस्ट कहा था.

न जातिवाद धम्म विचार है और न कम्मुनिस्ट विचार धम्म विचार है. जातिवादी लोगों और कम्मुनिस्ट लोगों ने धम्म या आंबेडकर साहब से अपना रिश्ता बताने का, जोड़ने का प्रयास करना उनका अपमान करना है. भारत सर्कार ने भी जातिवाद के प्रचार को तथा कम्मुनिस्ट के विचारों को आतंकवादी विचार करके घोषित करना चाहिए, तभी ही देश में जनतंत्र की उचित रक्षा होगी.