मंगलवार, 31 मार्च 2020

कोरोना विषाणु और भगवान का आशीष


हैलो, मेरे भारत देशप्रेमी बहनो और भाईयों, आपने हिंदूधर्म प्रचारक राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आर एस एस) द्वारा बनाए गए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को देश की गद्दी सोंपी उनका मुखिया प्रधान मंत्री बना, जिसका नाम नरेंद्र मोदी है। इनके कार्य काल में हिंदूधर्म को विशेष आश्रय मिला।

जो वन्दे-मातरम बोलेगा वह देश-भक्त, जो नही कहेगा वह देश-द्रोही ऐसा प्रचार आर एस एस के हिंदूधर्म (राष्ट्रीय?)अंध:भक्तों ने किया, एनआरसी-एनपीआर-सीएए को सिर्फ़ हिंदूधर्म को बढ़ावा देने के दृष्टि से क़ानून बनाया, ऐसी कोनसी अच्छाई है हिंदूधर्म में ? सिर्फ़ मनुस्मृति का ब्राह्मणी राज लाने के लिए यह सबकुछ कसरत चल रही है।

हिंदू धार्मिक कार्यों में पंतप्रधान उपस्थित रहे, हिंदू धर्म में गाय को पवित्र मानकर उसके लिए गो-शालाएँ बनाए गए। हिंदू गाय का माँस खानेवाले और उनका व्यवसाय करनेवालो पर जानलेवा हमले हुए। यह हमले हिंदूधर्म के ठेकेदारों ने करवाए, जिन्हें पुलिस मदत करते हुए नज़र आयी।

हिंदुसंत महर्षि पतंजलि द्वारा प्रस्तुत योगविद्या बाबा रामदेवने प्रचारित की है, उन्होंने योगासन द्वारा रोग भगाने का दावे किए, प्राणायाम द्वारा सभी रोगों का इलाज सम्भव है ऐसा कहा गया तब भी रोग नही गए तो उनके साथ आयुर्वेदिक औषधि को बढ़ावा दिया गया, हिंदूधर्म प्रचार के साथ ख़ूब मुनाफ़ा कमाया गया।

हिंदूधर्म में गाय को माता कहा गया है क्यूँकि वह बहुत फ़ायदेमंद है, उसे राष्ट्रीय पशु के रूप में पेश किया गया, सिर्फ़ देशी गाय पवित्र होती है, विदेशी नही इसलिए देशी गाय की पूजा का प्रचार-प्रसार ज़ोरों से चला, उनके गोबर और मूत्र की महिमा इतनी बतायी गयी की वह हर बीमारी को भगाने में सक्षम है, अब कोरोना को भगाने में क्यू नही काम आ रही है?

राममंदिर जन्मभूमि विवाद सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था, उसका फ़ैसला हिंदुओं के हितो में देनेवाले न्यायाधीश को सिंहासन पर बिठाया गया। मुस्लिम नाराज़ हुए। जो लोग हिंदुधर्म के ख़िलाफ़ बोलते रहे उन्हें देशद्रोही कहना सुरु हुआ, जिन्हें इस ढंग से ज़लील किया गया।

राममंदिर को बनाने के साथ-साथ बाबरी मज्जिद भी बनवाने के लिए मदत करने के लिए फ़ैसले होते गए। आशीर्वाद की बरसाद करनेवाले बुवाबाजों, संत-महंत फलने-फुलने लगे। बीजेपी में संतों को टिकिट देकर विजयी किया गया। जो संसद में जाकर अपने अ-वैज्ञानिक विचारों का प्रचार करते रहे।

क्या राम मंदिर को बनाने का कार्य विज्ञान को बड़ावा दे रहा है? काल्पनिक रामायण विचारों पर आधारित मूर्तियों की पूजा करना और उन मूर्तियों से आशीर्वाद की अपेक्षा करना बहुजन-हित-सुख कार्य है? राम की जन्मतिथि क्या है? उनकी मृतु तिथि क्या है? रामायण एक दंतकथा है जो वर्ण-जाती वाद का प्रचारक है।

कोरोना वाइरस का डर पूरे विश्व को है, वह तबायी का दूसरा नाम है, सभी-मंदिरों-मज्जिदो के पंडित-मुल्ला रो रहे है। कोरोना के बला से डर कर अपने-अपने घरों में बंद हो चुके है, राम सुट्टी पर है, परंतु डाक्टर, नर्स, कंपाउंडर, सफ़ाई कर्मचारी, फ़ार्मसी चालक, किराना व्यावसायिक, सेना-पुलिस और किसान काम पर लगे है।

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हिंदूधर्म के राम से आशीष पाने के लिए पूजा-पाठ कर रहा है, हिंदूलोग अपने-अपने घरों में आरतियाँ कर रहे है, तथा मुस्लिम लोग भी मज्जिदो में नमाज़ पढ़ने में जा रहे है, उन्हें कहा जा रहा है की आप अपने-अपने भगवानों की पूजा-अर्चा अपने-अपने घरों में करो, क्यूँ पूजा करवा रहे हो?

ईश्वर को नींद से जगाने के लिए मंदिर की घंटाए बजायी जाती है, इसे किसी व्यक्ति के सम्मान के लिए नही बजायी जाती है, पर हर घर में घंटाए नही होती इसलिए थाली और थालियाँ बजवाई गयी, यह हिंदूधर्म प्रचार का कार्य है। बीजेपी अंध: भक्तों की पार्टी है जो सिर्फ़ हिंदू धर्म को ही राष्ट्रीय धर्म के रूप में उचित मानती है।

हिंदूधर्म के काल्पनिक ग्रंथ रामायण है, जो इतिहास के व्याख्या में नही आता, उसके आधारपर मूर्तियाँ बनाकर काल्पनिक रूप दिया जा रहा है, कहते है की उनके आशीर्वाद से कल्याण होता है, शेकडो सालों से उनकी पूजा-अर्चा हो रही थी तो भारत के राम मुस्लिमों के ग़ुलामी को क्यूँ बरदास्त करते रहे, अंग्रेजो के साथ क्यू नही लढ़े ?

सुना है की कोरोना वाइरस को भगाने के लिए भारत देश में २१ दिन का लाक-डावुन किया गया है, हिंदू लोगों की माँग को पूरी करने के लिए राष्ट्रीय प्रसारण दूर-दर्शन टीवी पर रामायण सुरु किया जाएगा। हिंदू जनता अगर कहेगी की गु-गोबर कोरोना के इलाज के लिए सक्षम है तो क्या नरेंद्र मोदी सरकार विज्ञान को बाजु में हटाकर गु-गोबर से इलाज कराएगी?

नरेंद्र मोदी एक अनपढ़ अंध:भक्ति भाव में लिप्त पंत-प्रधान है, उन्हें सिर्फ़ हिंदू देवी-देवता, पूजा-अर्चा पर विश्वास है, यह एक प्रकार की नशा है, जिसमें न विटामिन, प्रोटीन, मिनरल या वसा है, अफु है। नशाबाज को ड्राइविंग करने दिया जाए तो वह उचित मुक़ाम पर कैसे ले जाएगा?

कोरोना एक जानलेवा वाइरस है, उसकी दवा नही है, पर उसपर विजयी होने के लिए हमारे शरीर को शुद्ध हवा/प्राणवायु, अल्कलाईन पानी, सूरज की फ़ॉर-इन्फ़्रारेड किरणों और संतुलित/पोषक आहार की ज़रूरत है, जिनसे हमारा शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, इनकी पूर्ति में उचित क़दम उठाने की ज़रूरी है।

हमारे जनतंत्रिक देश का तानाशाह /प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारने हिंदू धर्म की अंध:भक्ति पूरे देशपर थोपनी सुरु की है। उनका पुरज़ोर विरोध होना चाहिए। अन्यथा देश की जनता कोरोना वाइरस से नही बच पाएगी। जल्दी से जल्दी-धार्मिक अवडंबरो पर रोग लगानी होगी। यह कार्य मोदी सरकार नही करेगा, हमने ही अपने आचरण से करना होगा, जनजागृति और जनसहयोग से शंभव है।

बुद्ध धम्म और नैतिक तत्वज्ञान


तथागत गौतम बुद्ध का "धम्म" बहुजन 
बुद्धधम्म यानी बुद्धीझम, नीति या धम्म है, धर्म या रिलीजन नही ?
Religion, human beings’ relation to that which they regard as holy, sacred, absolute, spiritual, divine, or worthy of especial reverence. It is also commonly regarded as consisting of the way people deal with ultimate concerns about their lives and their fate after death. In many traditions, this relation and these concerns are expressed in terms of one’s relationship with or attitude toward gods or spirits (https://www.britannica.com/topic/religion)

गौतम बुद्ध (ई सा पू - ५६३ - ४८३) ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक से परे है, धर्म इंसान और ईश्वर में रिश्ते निभाने की वकालत करता है, मात्र गौतम बुद्ध मानव का मानव से रिश्ते कैसे रहे इसकी बात करते है, इसलिए बुद्ध विचार धर्म/रिलीजन नही है।

बुद्ध विचारों को धम्म/नीति कहते है, जिसका उद्धेश "बहुजन (बहु=अनेक,सभी, कुल) हिताय, बहुजन सुखाय, आदि कल्याण, मध्य कल्याण, अंत्य कल्याण, लोकानूकंपाय, लोकविदु देव(लोगों में प्रसिद्ध, बुद्धिमान) व मनुष्यास(सामान्य के लिए) पकासेन (ईसापू - ५२८ में वाराणसी में प्रकाशित) किया गया है। जो "आर्य अष्टांगिक मार्ग" के रूप में प्रशिद्ध है। यह आठ अँगो का है, उसमें -
(१) सम्यक् दृष्टि/दर्शन - प्रतित्य सम्मुत्पाद (कार्य-कारण सिद्धांत, मज्जिम निकाय-१/३/८) कार्य कारणों के सामूहिक प्रयास से बनते है।

यह सिद्धांत १२ अँगो से बाँटा गया है।
पहला - अविज्ञा/ अज्ञान - यह क्या है? इंसान को किसने बनाया? इसका ज्ञान नही होना, इंसान को ईश्वर ने बनाया ऐसा कहना अज्ञान है। सब्ब (सभी) चीज़ें/ वस्तु अ-नित्य/अ-नात्म, अ-निश्वरिय, अ-शाश्वत, अ-सर्वज्ञ है। इंसान को किसने बनाया? माँ-बाप (नर-नारी) के मैथुन से वीर्य (बीज) द्वारा इंसान बना।
दूसरा- संस्कार- बाप के बीज का माँ के गर्भाशय में सम्मिश्रण होना।
तीसरा - विज्ञान- पृथ्वी, आप, तेज़ और वायु नामक ४ महाभूतों के पूर्ति से माँ के गर्भ में चेतना/जीव पैदा होना।
चौथा- नामरूप - नाम = चेतना और रूप = शरीर, जीव (सप्तधातु = रस, रक्त, माँस, अस्थि, मज्जा, वीर्य और मेद) के साथ शरीर।
पाँचवा- ६ आयतन - आयतन = ज्ञानेन्द्रिय_मश्तिक, आँख, कान, नाक, त्वचा, जीभ बनना।
छटा - फस्स - इसे हिंदी में स्पर्श कहते है, इंद्रियों का आपसी जुड़ना, तथा मुख, आमशय, पक्वाश्यय, छोटी-बड़ी आँते, मलाशय, मूत्राशय, यकृत, पित्ताशय, अग्नाशय और प्लिहा का आपसी) तालमेल होना।
सातवाँ - वेदना - स्पर्श के कारण संवेदना, जागृति ((मेंदु से विचार, त्वचा से स्पर्श ज्ञान, नाक से गंध, कान से आवाज़, जीभ से चव और आँखों से दृष्टि, देखावा) का ज्ञान उत्पन्न होना।
आठवाँ- तन्हा - तृष्णा, ईच्छा उत्पन्न होना।
नौ- उपादान- उप = कम और दान- लेना माँ से नाल द्वारा कम से कम पोषण आहार लेना।
दसवाँ - भवों - संतान में भावनाओं का विकाश होना, जैसे-सुख (वांछित वस्तु/सेवा की प्राप्ति) , दुःख (वांछित वस्तु/सेवाओं की न प्राप्ति) या न सुख-न दुःख।
ग्याराहवाँ - जाति - जाती = जन्म, जीव ९ माह ९ दिन के बाद गर्भ से बाहर निकलना,माँ का प्रसूत होना और
बारहवाँ - ज़रा-मरण - ज़रा = बिमारी। इंसान की धरती पर ४ अवस्थाएँ होती है - बाल - लोभी, किशोर- भोगी, युवा- त्यागी, बुढ़ापा- बीमारी से मृतु_तक शोक (दुःख) परिदेव (पच्छाताप) यह सभी दुःख समुदाय केवल अज्ञान के कारण निर्माण होते है, इंसान के निर्मिती में भगवान, ईश्वर, परमेश्वर, देव, अल्ला या गाड का कुछ भी योगदान नही है।

(२) सम्यक् संकल्य- बहुजनो के हित-सुख के लिए पहले बताए गए सम्यक् दृष्टि /दर्शन के अनुसार धृढ विश्वास करे।

(३) सम्यक् वाचा - वाचा = वाणी। बहुजनो के हित-सुख के लिए किए गए सम्यक् संकल्प के अनुसार संवाद, संभासन या भाषण करे।

(४) सम्यक् कर्म - कर्म = काम, कार्य। बहुजनो के हित-सुख के लिए सम्यक् वाणी के अनुसार कार्य करे।

(५) सम्यक् आजीविका - आजीविका = उपजीविका। बहुजनो के हित-सुख के लिए सम्यक् कर्म के अनुसार जीवन-यापन करे, उदर भरण, पालन-पोषण करे।

(६) सम्यक् व्यायाम - व्यायाम = आदत, बहूजनों के हित-सुख कि लिए सम्यक् आजीविका के अनुसार कार्य करने की आदत डाले।

(७) सम्यक् स्मृति - स्मृति = स्मरण, याददाश्त। बहुजनो के हित-सुख का सम्यक् व्यायाम के अनुसार हमेशा ख़याल, स्मरण रखे। और

(८) सम्यक् समाधि - समाधि = एकाग्र चित्त। चित्त चंचल होता है, उसे बहुजन हित-सुख के लिए सम्यक् स्मृति के अनुसार एकाग्र रखकर कार्य करे तो सुख सम्भव है।

बुद्धधम्म विज्ञान को बढ़ावा देता है, न की स्वर्ग-नर्क का डर-लालच। 
बुद्धिझम अपनाओ ख़ुश रहो, सुख पाओ।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

आर्थिक जनतंत्र जनआन्दोलन




र व्यक्ति अधिकाधिक सुख पाना चाहता है. उसका उद्धेश भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त सम्मान भी पाना होता, मगर वह उसे ही मिलता, जो पहले दूसरों को सम्मान देता. जो देने में... जितना कंजूसी करेगा, उतना ही उसे सम्मान भी कम ही मिलेगा. कोई व्यक्ति सम्मान स्वयं दे रहे, तो कोई ईश्वर द्वारा दिलाने का बहाना बना रहे. बहुसंख्याक लोग सुख-सम्मान पाने के लिए मंदिर-मज्जिद, गिरजाघर में चक्कर लगा रहे. 

ईश्वर को कितना भी सम्मान दो वह कभी वापस नही आता, पर ईन्सान को दिया सम्मान वापस जरुर आता. ईन्सान ने इन्सान को सम्मान देने के बजाए ईश्वर को सम्मान दिया तो ईन्सान सम्मान से वंचित रहेंगे. ईश्वर से प्यार करना कोई जरुरी नहीं पर ईन्सान से नफरत बहुत भारी महँगी साबित होगी. जो लोग ईन्सान से नफरत और ईश्वर से प्यार करते है, वे लोग पढ़े-लिखे हो सकते पर वैज्ञानिक सोच का उसमे अभाव जरुर रहा. क्या पत्थर के देवता से प्यार करना वैज्ञानिकता साबित होती?

जर्मनी में सन १८१८ में कार्ल मार्क्स का उदय हुआ. उन्होंने काफी धर्मों का अध्ययन किया, जिसमे ईसाई और मुस्लिम धर्म प्रमुख रहे. उन्होंने अपने अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला की हर ‘धर्म’ के ठेकेदार ईश्वर के जरिए भक्तों का आर्थिक शोषण करने में मदत करते है. उसके पोप, मुल्ला, पंडित आर्थिक विषमता को बढ़ावा देने के लिए स्वर्ग-नरक की लालच या डर बताकर लोगों को वास्तविक जीवन से गुमराह करते रहे. हर धर्म कार्ल मार्क्स के नज़रों में “अफीम” रहा. 

सन १८८३ में उनके प्रेरणा से ही रूस (रशिया) में पुरोहितों का मजहबी शोषण और सामंती झारशाही ख़त्म हुयी. आगे चीन का सन १९३६ में ७७% अफीमी (महायानी, हिन्दू) विचारों का खात्मा किया. अभी-अभी युगांडा में “आर्थिक क्रांति” हुयी, जिसमे ‘इदी अमिन’ नामक शासक ने सभी निजी उद्दोगों का राष्ट्रीयकरण किया. अभी सामंती आतंकी गदाफ़ी को गोलियों से भुना व शोषित जनता ने उनके शासन पर धावा बोला.

बाबासाहब आंबेडकरने गोलमेज परिषद् में कहा था, जब भी स्वतंत्र भारत का संविधान बनेगा वह “एक व्यक्ति, एक मत” के साथ “एक व्यक्ति, एक मूल्य” के पायाभूत सिद्धांत पर निर्भर हो, जिससे “आर्थिक जनतंत्र” की बहाली हो, इस क्रान्तिकारी भूमिका का आग्रह किया था. वही उनके जीवन का अंतिम उद्धेश रहा था।
 
सन १९४६ में भारत का संविधान कैसा हो? इस विषय पर एक “प्रारुप” लिखा, जो बाद में भारतीय कांग्रेसी नेताओं के सामने चर्चा के लिए दिया गया. पर भारतीय शोषित-पीड़ित लोगों के हितों को दुर्लक्षित करते हुए उसे भुला दिया गया. अकेले बाबासाहब के मतों से वह क्रान्तिकारी विचार भारतीय संविधान के धारा के रूप में पास नही हो पाए. 

दिनांक १७ दिसंबर १९४६ के संविधान सभा में भी बाबासाहबने “आर्थिक जनतंत्र” का ही जिक्र और आग्रह किया. फिर भी केवल मनुवादी, कांग्रेसी नेताओं के विरोध के कारण भारत में “राज्य समाजवाद” नही आ सका. जिसका नतीजा आज भारत में अमीर और गरीब वर्ग है.

संविधान सभा में दिनांक १९ नवम्बर १९४८ को बाबासाहब ने और आर्थिक जनतंत्र की पेशकश की, “राजनैतिक जनतंत्र को प्रतिपादित करते हुए हमारी यह भी इच्छा है कि आर्थिक जनतंत्र को आदर्श स्वरुप प्रतिपादित किया जाना चाहिए....इस संविधान सरकार के घटकों के सम्मुख भी एक आदर्श रखना चाहता है. 

आदर्श है, “आर्थिक जनतंत्र” का, मेरे ख्याल में इसका अर्थ है – “एक व्यक्ति, एक मूल्य.” बाबासाहब आंबेडकरने “राज्य समाजवाद” को निम्नलिखित शब्दों में स्पष्ट किया था, “राज्य समाजवाद योजना में, राज्य के प्रभुत्व में, सामूहिक ढंग की खेतीबाड़ी के साथ कृषि और औद्धोगिक क्षेत्र में, संशोधित रूप में, राज्य समाजवाद की स्थापना की गयी है. इस योजना में कृषि और उद्धोग में, पूंजी लगाने का दायित्व राज्य पर सोंपा गया है.

 राज्य द्वारा पूंजी लगाए बगैर न भूमि और न ही उद्धोग बेहतर उत्पादन दे पाएंगे. इसमें बिमा राष्ट्रीयकरण की प्रस्तावना दोहरे उद्धेश से की गई है. राष्ट्रीयकरण की हुई बिमा कंपनी एक निजी बिमा कंपनी की तुलना में व्यक्तिगत धन के सुरक्षा की गारंटी अधिक देती है. राज्य विमा कंपनी, चाहे कैसी भी परिस्थितिया हो, धन लौटाने का पूरा उत्तरदायित्व लेती है. 

व्यक्ति को किसी प्रकार का भय नहीं रहता है. राज्य के पास बिमा कंपनी द्वारा नियमित एक निश्चित पूंजी आ जाती है, जिसे वह अपने औद्धोगिक कार्यों में लगा सकता है, अन्यथा राज्य के खुली बाजार से पूंजी लेनी पड़ती है, जिसके ब्याज की दरे ही बहुत ऊँची होती है. अता राज्य को घाटा उठाना पड़ता है. भारत में, तेजी के साथ औद्धोगिककरण के लिए “राज्य समाजवाद” अति आवश्यक है.” (डॉ. आंबेडकर और भारतीय संविधान; लेखक- एल. आर. बाली; दूसरा संकरण, पृष्ट-४९-५०)

भारतीय संविधान में कांग्रेसी प्रयास से ‘धारा-३१’ (काली धारा) के तहत संपत्ति को व्यक्ति का मौलिक हक़ दिया गया. व ‘धारा- २४’ के तहत संपत्ति का मुहवजा दिए बगैर नही छिना जा सकता. व्यक्ति को उसके संपत्ति का मुहावजा दिए बिना नही छीन सकती. सरकार व्यक्ति के सामने अपाईज बनी. इन दो धाराओं के जरिए पूंजीवाद को जन्म दिया. 

जिससे आर्थिक विषमता को बढावा मिला. इसे वे कांग्रेसी बहुमतों का नतीजा मानते रहे. उनका पाप वे अपने सिर ढोने को और तयार नही थे. इसी वजह डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर अपने ही हातों से भारतीय संविधान को ही जलाना चाहते थे. जो संविधान आर्थिक विषमता को पैदा करता है, वह अब ९९% गरीबों के लिए किस काम का है? उसके समाप्ति के बगैर भारत में ‘आर्थिक जनतंत्र’ आना असंभव है. बिना आर्थिक जनतंत्र के भारत में सार्वजानिक जनकल्याण असंभव है.

अमरीका के १६ वे राष्ट्राध्यक्ष अब्राहम लिंकन ने कहा था, “जब आवाज उठाने की जरुरत होती, तब जो लोग चुपचाप बैठते, वे डरपोक होते है और वे डरपोक लोगों की ही फ़ौज बनाते.” तो सुप्रसिद्ध निग्रो क्रांतिकारक मार्टिन ल्युथर किंगने कहा था, “दुर्जनों के दुष्ट और बुरे कर्मों से सज्जनों का मौन अधिक धोकादायक होता है क्योंकि वह दुष्ट कर्मों के लिए ही मौन सम्मति होती है.” 

डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर (सन-१८९१-१९५६) का कहना था, “गुलामों को गुलामी का अहसास करा दो, फिर वही अपने गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए बगावत करेंगे.” तथा संविधान सभा में बाबासाहब ने कहा था, “जो लोग आर्थिक विषमता के शिकार है, वे ही लोग बढ़े मेहनत से बनाए इस “राजकीय जनतंत्र” की धज्जिया उडाएंगे. वह दिन भारत के इतिहास में सबसे दुखदायी होगा.”

डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने ख्रिश्चन, ईस्लाम, हिन्दू, शिख और जैन धर्म का अध्ययन कर उसमे ईश्वर, भगवान, अल्ला, आत्मा परमात्मा, पूजा-पाठ और स्वर्ग-नर्क की अवैज्ञानिक विचारधारा देखी तथा कार्ल मार्क्स के साम्यवाद में हिंसक तानाशाही को पाया. 

न धर्मो के पास ‘जनतंत्र’ दिखा और न ‘साम्यवाद’ में. हर धर्म के ठेकेदार ईश्वर के शासन की वकालत करते है, जो तानाशाही से लिप्त है तथा जो अधार्मिक साम्यवाद है. उनमे भी जनतंत्र का अभाव पाया. इसलिए उन्होंने ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ इस कल्याणकारी नैतिकता (धम्म) का राश्ता अख्तियार किया. तथा गरीब लोगों को आर्थिक समता के लिए धम्म में सम्मिलित किया.

धर्म बनाम धम्म क्यों है? डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने (‘इनसायक्लोपीडिया ऑफ़ रिलिजन एंड इथिक्स’, वालुम-१०, पेज-६६९ के हवाले से) बुद्ध विचारों को तात्विक और वैज्ञानिक होने से धम्म कहा, मगर धर्म नही. इसका मतलब निती, न की रिलिजन या धर्म नही..! 

बुद्ध के विचार ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नरक, पूजापाठ के खिलाफ होने से वे धर्म, रिलिजन के परिभाषा में सम्मिलित नही किया जा सकता, ऐसा बाबासाहब का ही तर्क रहा था. उन्होंने बुद्ध विचारो पर जो महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा उसका शीर्षक “द बुद्ध एंड हिज रिलिजन” के बजाए “द बुद्ध एंड हिज धम्म” इसी कारण रखा. धम्म का मतलब ‘धर्म’ नही, निती है, आर्थिक जनतंत्र है, आदर्श जनतंत्र है.

बाबासाहब अम्बेडकरने दिनांक १५ अक्टूबर १९५६ को नागपुर के अपने भाषण में कहा, “धम्म की जरुरत गरीबों को है. धम्म की जरुरत पिडित लोगों को है. गरीब व्यक्ति आशाओं पर जीता है. Hope! जीवन का मूलाधार आशाएं है. अगर आशा ही नष्ट हुयी तो जीवन कैसा होगा? धम्म आशावादी बनाता और गरीबों को सन्देश देता है, ‘बिलकुल मत डरों, होगा, जीवन आशादायी होगा......!

इसके विपरीत धर्मों का कहना है, ईश्वर ने सृष्टि, आकाश, वायु, सूरज, चाँद आदी सभी कुछ निर्माण किया. हमें ईश्वर ने कुछ भी और बनाने के लिए बाकी नही रखा, इसलिए ईश्वर की हमने आराधना करनी चाहिए. ख्रिश्चन धर्म के अनुसार तो मृत्यु के बाद एक निर्णय का दिन (Day of Judgment) होता है. उसी दिन के निर्णय के अनुसार सभी कुछ तय होता है, उससे ही कोई स्वर्ग या नर्क में जाते है.

“बुद्ध धम्म में ईश्वर और आत्मा को कुछ भी जगह नही है. बुद्धने बताया विश्व में सभी ओर मानव निर्मित पीड़ा है. ९०% लोग उसके पिडित है. पिडित गरीब लोगों को मुक्त करना बौद्ध धम्म का मुख्य लक्ष है. तथागत बुद्ध के अलावा कार्ल मार्क्स ने नया और क्या बताया? बुद्ध ने जो तत्वज्ञान बताए उसे ही कार्ल मार्क्स ने अलग ढंग से बताया. 

 बुद्ध का यह नया मार्ग बहुत जवाबदेहि है. हमने कुछ संकल्प किया है, उसे युवकों ने ख्याल में लेना चाहिए. उन्होंने केवल स्वार्थी नही बनना चाहिए तो ‘अपने कमाई का २०% हिस्सा धम्म कार्य में दूंगा,’ ऐसा संकल्प करना जरूरी है. मुझे सभी को बराबर लेना है.”

विश्व के राजनैतिक विचारक ‘भारतीय जनतंत्र’ की ओर बड़े आशा के साथ देखते आ रहे है. आधुनिक भारत का जनतंत्र बुद्ध विचारों की केवल राजकीय उपज है. इसलिए यह “आदर्श जनतंत्र” नही, उसे “आदर्श” बनाने के लिए “आर्थिक जनतंत्र” की जरुरत है. विश्व में पूंजीवादी सरकारों के जरिए मुनाफाखोरी, बेरोजगारी, महंगाई, उपासमरी, अशिक्षा, असुरक्षा, आतंकवाद, नक्षलवाद पनप रहा. केवल भारत में ही नही तो पुरे विश्व में “आर्थिक जनतंत्र” की जरुरत है. 

भारतीय भूमि “आदर्श जनतंत्र” के लिए उत्तम उपजाऊ है. क्योंकि यहाँ पर “राजकीय जनतंत्र” से उसकी मशागत हो चुकी है. भारतीय लोग “जनतंत्र” के आदि हो रहे है. जिस देश में राजकीय जनतंत्र या धम्म है, उस देश में “आर्थिक जनतंत्र” को कायम करना बहुत ही आसान कार्य है. अभी महंगाई की मार अमीरों को नही, लेकिन गरीब लोगों को जरुर महसूस हो रही है. अनाज के अभाव में उत्तर कोरिया के नरभक्षी (आदमखोर) प्रथा का उदय हुआ, वैसी स्थिति भारत में न हो, इसलिए गरीबों के समस्याओं पर सरकारने विशेष ध्यान देने की बहुत जरुरत है. अन्यथा आदमखोरी निर्माण होने से किसी कोई भी सरकार नही रोक सकती. “आर्थिक जनतंत्र” के बिना सभी प्रयास विफल है.

आन्दोलन क्या है? जाती व्यवस्था के शोषित-पीड़ितों को उस हद तक जागृत करना की वे स्वयं अन्याय के खिलाफ बगावत पर नही उतरते. उन्हें उनके हकों से अवगत करना. उसके प्राप्ति के लिए समय-समय पर कार्यक्रम देना, उसे नियंत्रित करना. हमारी मुख्य मांग भारत में आर्थिक जनतंत्र की है और उसके अवरोधी “भारतीय संविधान की धाराए ३१ और २४ को निरस्त क्या जाए”. 

हमारा आन्दोलन राजकीय या धार्मिक नही है पर उससे कम भी नही है, यह आनिवाले चार साल में, सन २०१७ तक साबित भी करना हमारे आन्दोलन का निश्चित व निर्धारित उद्धेश है. यह आन्दोलन शांतिमय और जनतांत्रिक है क्योंकि आर्थिक जनतंत्र भारत में कायम करना ही उनका मुख्य उद्धेश है. हमें निश्चित आशा है की शोषित-पीड़ित जनता इस आन्दोलन के साथ जुडकर कंधे से कंधे मिलाकर अपने हकों, सुखों के प्राप्ति के लिए सहयोग देंगे.

बाद में धारा - ३१ में संशोधन हुआ, वह इस प्रकार है, "देश की आजादी के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश के विकास की थी तथा इसके लिए जमीन की जरूरत थी। जमीन पर कब्जा बड़े जमींदारों का था। यदि उनसे यह जमीन जब्री ली जाती तो यह संविधान में शामिल किए गए मूल अधिकारों के हनन का मामला बनता। लिहाजा इस स्थिति से निपटने के लिए संविधान में 9वां शैड्यूल जोड़ा गया तथा 1951 में संविधान के अनुच्छेद 31 में संशोधन किया गया तथा इसमें 31बी धारा जोड़ी गई।" (://www.punjabkesari.in/national/news/section-31b-has-opened-the-path-of-development-745018) सम्पत्ति धारण करनेवाला मूलभूत अधिकार को सामान्य किया गया।

आर्थिक जनतंत्र ‘जनआंदोलन’ से क्या फायदा होगा? विश्व के हर व्यक्ति को उत्तम १. अन्न, २. कपडे, ३. घर, ४. शिक्षा, ५. आरोग्य, ६. मनोरंजन तथा ७. रोजगार की जरुरत है. क्या विश्व की कोई भी पूंजीवादी सरकार इसे बहाल करने में सक्षम है? संपत्ति धारण करने का हक़ हर व्यक्ति को मालक बनाता है, इससे अगर कुछ लोग मालिक है, तो कुछ निर्धन लोग गुलाम होते है. 

क्या मालक और गुलाम के रिश्तों में न्याय, स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के नैतिक मूल्य पाए जाते है? हजारों सालों से मानवीय समाज संपत्ति के मालिकाना हक्कों को पाने के लिए हमेशा संघर्षरत रहा है. आदर्श नैतिक मूल्यों को शोषको ने हमेशा नकारा, उसका नतीजा विश्व में दुःख की बढौतरी हुयी है.

वर्णव्यवस्था अब व्यापार के रूप में जीवित है. मुनाफाखोरी से ही आर्थिक शोषण और विषमता बढ़ी है. उत्पादन के सभी साधन सरकारी हो. सभी लोग सरकार के अधीन निर्धारित काम ईमानदारी से करे. सरकार उन्हें उचित मोबदला दे. खाजगी शोषण के सभी दरवाजे बंद हो. इसे नकारनेवालों को जल्दी से जल्दी उचित और कठोर सजा मिले. 

सहकारी ढंग से मानवीय समाज में व्यवहार हो. व्यक्ति संपत्ति (पैसे) का गुलाम न बने. पैसा व्यक्ति का गुलाम रहे. पैसे से प्यार, समता, न्याय नही खरीद सकते. पैसा इंसानियत से बढ़कर नही. पैसे के लिए मानवी मूल्यों का ध्वंस करना, गुनाह है. आर्थिक जनतंत्र में व्यक्ति के सामने पैसा, संपत्ति दुय्यम है, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुभाव ही अहम् है.

आर्थिक जनतंत्र (राज्य समाजवाद) को कायम करने से....!
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१. जमीन, उद्योग, तथा बिमा का राष्ट्रीयकरण होगा.
२. अनाज, वस्त्र, निवारा, आरोग्य, शिक्षा, मनोरंजन व रोजगार की पूर्ति.
३. हर व्यवहार सहकार से चलेगा, न की खाजगी मुनाफे से.
४. सभी के लिए परिवर्तनीय किन्तु “समान वेतन आयोग” होगा.
५. ‘एक देश, की एक भाषा’ होगी, जिससे राष्ट्रिय भाईचारा बढेगा.
६. जनसँख्या नियंत्रण के लिए ‘समान नागरी कानून’ लागू होगा.
७. राष्ट्रीयता, मानवतावाद, पर्यावरण, वैज्ञानिक विषयों पर शिक्षा का प्रचार होगा.
८. जाति-वर्ण-वंशवाद, भ्रष्टाचार, नक्षलवाद तथा धार्मिक आतंकवाद ख़त्म होगा.

विश्व के सभी जनतांत्रिक जनता का मानव कल्याण कार्य में योगदान जरुरी है. सभी को सुख-शांति के इस जनआन्दोलन में सभासद होकर कार्य करने का मौका है. भारतीय १% अमीर लोग गरीबों को सुख से जीने देना नही चाहते. गरीब लोग अब आन्दोलन के जरिए अपने “एक व्यक्ति- एक मूल्य” मानवीय हकों को पाने के लिए बगावत पर उतरे है. तो विश्वव्यापी “गरीब बनाम अमीर” युद्ध होने से कोई भी व्यक्ति या सरकार नही रोक सकती. यह विश्व का तीसरा महायुद्ध होगा. यह केवल आकलन ही नही, तो प्रयास भी है.

‘लिओ टॉलस्टाय’ने सही कहा है, “आप कितना फासला काटा, यह कम महत्वपूर्ण है, पर आप सही दिशा में गए या नही, यह बात अधिक महत्वपूर्ण है.” हमारे भारतीय राजनेताओ ने कितने दिन शासन किया? यह महत्वपूर्ण नही है, उन्होंने सही “आर्थिक जनतंत्र” के दिशा में कार्य किया या नही? इसे देखना अब बहुत जरुरी है. यही देखने के लिए ‘आर्थिक जनतंत्र जनांदोलन’ हमेशा प्रयास करेगा. 

यह सभी देशी-विदेशी बुद्धीजीवी लोगों का महा संघटन है. इसमें होने वाले हर बदलाव को बहुमतों से स्वीकारने पर जोर दिया जाएगा. जिस व्यक्ति के विचार ‘आर्थिक जनतंत्र’ को पूरक है, वे इस संघटन के सभासद बनने हेतु ईमेल द्वारा आवेदन करे और सभी भारतीय लोगों को सुखमय बनाने का संकल्प तथा प्रयास करे. यही हमारी सभी भारतियों से गुजारिश है.

धार्मिक, जाती, वर्ण और वर्ग से भारतीय शोषित-पीड़ित लोगों को पूंजीवादी व्यवस्था ख़त्म करके आर्थिक जनतंत्र प्राप्ति के लिए डॉ. बाबासाहब अम्बेडकरने संविधान सभा में दिनांक १९ सितम्बर १९४९ को सिंहगर्जना की थी, “आप जिन स्वामियों के लिए हल चलाते हो वे आपको निचा दिखाते है. आप मेहनतकश लोग ध्यान से सुन्दर वस्त्र बुनते है उसे आपके दुश्मन पहनते है. तुम बहुत सुस्ता चुके, अब शेरों की तरह उठो पर ओस की तरह उठो, अपने बेड़ियों को उतर के फेंको. आप बहुत बहुत ज्यादा है, और आपके दुश्मन बहुत कम है.” 

जबतक भारत में राज्य समाजवाद लागु नही होगा तबतक भारत से धार्मिक आतंकवाद, आर्थिक नक्षलवाद, पूंजीवाद, महंगाई, भुकमरी, कुपोषण तथा जातिगत समस्यओं का निराकरण नही हो सकता इसलिए भारतीय शोषित, पीड़ित जनता ने “राज्य समाजवाद” का आग्रह करना चाहिए. इसलिए हमारा नारा है, भारतीय संविधान की “धारा ३१ और २४” हटाव अर्थात “गरीबी हटाव, अमीरी हटाव!