शनिवार, 13 जुलाई 2013

आंबेडकर साहब का मुख्य उद्धेश (मिशन) क्या था?

 बाबासाहब आंबेडकरने फुल (आर्थिक जनतंत्र, एक व्यक्ति - एक मूल्य) के उद्धेश (मिशन) से देशसेवा की थी, मगर संविधान सभा में वर्णवादी कांग्रेसी नेताओ ने उनके हातो में सिर्फ फुल की पखडंडी (राजकीय जनतंत्र, एक व्यक्ति - एक मत) ही सौंप दिया. मनुवादी कांग्रेसियों के कारण ही देश का संविधान पूंजीवादी बना. 
संविधान का मसौदा किसने बनाया? यह जितना महत्वपूर्ण नहीं, जितना उसे क़ानूनी स्वरुप प्रदान करनेवाले 'संविधान सभा' का है. मनुवादी कांग्रेसी जनप्रतिनिधियों के 'बहुमतो' के कारण भारत का 'संविधान मनुवादी' बना, न कि अम्बेडकरवादी बना, उसी का नतीजा है की, देश में बहुसंख्यक लोग भिकारी, लाचार, गरीब और चोर, बदमाश है.

जो देशवासी मित्रजन, जनतंत्र में विश्वास करते है, उन्होंने बाबासाहब अम्बेडकर के फुल (उद्देश) को प्राप्त करने के लिए जनान्दोलन करना जरुरी है, उसी में सबका फायदा है.
अन्यथा हजारो सालो तक चिल्लाते रहे, तो भी कोई राजनेता या भगवान हमारे उत्थान के लिए आगे नही आएगा. जैसे हमारे पुरखे गरीबी में जिए, हम गरीबी में जी रहे है और वैसे ही हमारे बाल-बच्चे भी गरीबी में ही जियेंगे. सोचो और उचित क्रांतिकारी जनान्दोलन के तयार हो जाओ.

देश को ईमानदार राजनेता चाहिए, बेईमान नहीं. जाती से कोई ब्राह्मण नही होता और न जाती से मराठा... गुणों से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण होता है और गुणों से ही कोई व्यक्ति मराठा, महार, चमार... जिनके गुण अच्छे है, वे लोग ही अच्छे है, जो सिर्फ अपने अवगुणों से सिर्फ गाली गलौच करते है, वे हिंच है, जिसका दूसरा नाम हिन्दू, हिन् है, वे भी हिन् है और उनके देवी देवता भी हिन् ही है... संत कबीर कहते है, ऐसी वाणी बोलिए कोई न बोले झूट, और ऐसी करनी करिए, कोई न बोले उठ... 

बामसेफ/बीएसपी के पास न गुण उचित है, और न उनके कार्य... इसलिए ४० साल के लंम्बे अन्तराल के बाद भी वे कुछ भी हासिल नहीं कर सके... क्या जातिवाद को बढ़ावा देना यंही उनकी महान उपलब्धि है?

धर्मनिरपेक्ष = सर्वधर्म समभाव नहीं होता, पर यही अर्थ कांग्रेस पार्टी लेती है और खुद को धर्मनिरपेक्ष बताती, जो गैरप्रचार है. उसका सही अर्थ है = धर्म की अपेक्षा/जरुरी नही. क्योंकि उसमे इंसानों का ईश्वर से रिश्ता बताया जाता है, जो अवैज्ञानिक सोच है... बुद्धिज़्म को हमने निति = धम्म माना है, न की रिलिजन, धर्म... बुद्धिज़्म को धर्म में सम्मिलित करना गल्त है, क्योंकि उसमे ईश्वर के साथ इंसानों के रिश्ते को नकारा है. धर्म वे है जो ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नरक, राशी-भविष्य, पाप-पुण्य, पूजा, कर्मकाण्ड, यह अगर महायानी विचारो में पायी भी जाती है तो वे बुद्ध की शिक्षा नहीं है, वह ब्राह्मणवाद की घुसपेठ है... यह गलत धारणा प्रथम संस्कृत में और बाद में पाली में भी आयी है... पर उसे न आंबेडकर साहब ने स्वीकार किया और न मै भी मानता हूँ..

शिक्षा देने का सरकारी उद्धेश यह है की लोगों को सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले उत्तम कर्मचारी मिले. कुल जनसँख्या के केवल १५% नोकरिया होती है और से प्राप्त करने के लिए १००% जनता दौड़ रहे है, उसमे सिर्फ १५% लोगो को ही अवसर मिलेगा. बाकि ८५% भारतीयों के शिक्षा लेने का क्या फायदा रहा है?

अभी कम्पूटर का जमाना आया, उसमे हजारो लोगों के कार्यो को करने के लिए एक ही साफ्टवेअर काफी है. फिर सरकारी दफ्तरों में ईमानदारी से भी १५% नोकरियो के अवसर कैसे क्या मिलेंगे? मांग कम और सप्लाय ज्यादा तो क्या होगा? तनखा कम. तो क्या कम मेहनताना में महंगाई के साथ यारी बनाकर जीवन को सुखमय जिया जा सकता है?

देश में उचित योजना की कमी है. जिसके वजह से समस्याए हल होने के बजाए और भी बढ़ते जा रही है. राष्ट्रिय ईमानदारी के अभाव में राष्ट्रिय हितो के बजाए स्वार्थ उत्पन्न हुआ है. उसे ख़त्म करने का एकमेव और जालिम उपाय है, बुद्धधम्म का स्वीकार करना, स्वागत करना. बुद्ध धम्म अपनाओ देश और दुनिया को सुखमय बनाओ. अमीरी हटाओ, गरीबी हटाओ.

संविधान का मसौदा किसने बनाया? यह जितना महत्वपूर्ण नहीं, जितना उसे क़ानूनी स्वरुप प्रदान करनेवाले 'संविधान सभा' का है. मनुवादी कांग्रेसी जनप्रतिनिधियों के 'बहुमतो' के कारण भारत का 'संविधान मनुवादी' बना, न कि अम्बेडकरवादी बना, उसी का नतीजा है की, देश में बहुसंख्यक लोग भिकारी, लाचार, गरीब और चोर, बदमाश है.

जो देशवासी मित्रजन, जनतंत्र में विश्वास करते है, उन्होंने बाबासाहब अम्बेडकर के फुल (उद्देश) को प्राप्त करने के लिए जनान्दोलन करना जरुरी है, उसी में सबका फायदा है.
अन्यथा हजारो सालो तक चिल्लाते रहे, तो भी कोई राजनेता या भगवान हमारे उत्थान के लिए आगे नही आएगा. जैसे हमारे पुरखे गरीबी में जिए, हम गरीबी में जी रहे है और वैसे ही हमारे बाल-बच्चे भी गरीबी में ही जियेंगे. सोचो और उचित क्रांतिकारी जनान्दोलन के तयार हो जाओ.


मनुस्मृति के परिणाम


झाद भारत ने संविधान का शासन अपनाया, पर उसमे समता के लिए विषमतामय जातिवादी धोरण का स्वीकार किया है. भारतीय संविधान की धारा- ३४०, ३४१ और ३४२ यह हिन्दुधर्म के शुद्र और अतिशूद्र वर्ण के लोगो समता प्रदान करने के उद्धेश से स्वीकार की गयी थी. उसकी समय सीमा सविधान लागु होने के बाद केवल दस साल तक ही थी. मगर सन १९६० के बाद भी उसे अभीतक जारी रखा गया है. क्योंकि समता प्रस्थापित करने का लक्ष संविधान ने पूरा नहीं किया.

भारत के जनतंत्र के उद्धेश में समता बहाल करना यह मुख्य उद्धेश है, पर उसे हासिल करने के लिए जातिगत आरक्षण का सहारा लिया गया, वह भी उचित साबित नही हुआ, क्योंकि वह भारतीय कुल जनसंख्या के अनुपात में दिया गया. उसके जरिए पिछड़े वर्ग के केवल १०% लोगो को ही ऊपर उठाने का कार्य हुआ और ९०% पिछड़ों को भगवान भरोसे छोड़ा गया. क्या यह संविधान सभा का उचित कदम था? क्या उनके निर्णय प्रक्रिया में खामी नही रही? अगर खामी नही होती तो अबतक मनुवादी जाती के जहर को संविधान के माध्यम से समाज में फ़ैलाने के कार्यों को क्यों अंजाम दिया होता?

अलाहाबाद के उच्च न्यायालय ने “जाती सम्मलेन लेने पर पाबन्धी लगायी” यह उनका उचित कदम है पर जाती प्रथा को ख़त्म करने के लिए वह अपर्याप्त है. जबतक देश में विषमता बहाल करने के लिए उचित कदम नही उठाए जायेंगे तबतक जातिगत आरक्षण जारी रहेगा और जाती प्रचार भी जारी ही रहेगा, क्योंकि सरकारी दफ्तर ही जब जातिगत, सुविधा और गिनती सुरु रखती है, यानि उनका अप्रत्येक्ष प्रचार की कर रही है, तो जातिप्रथा और उनके परिणाम कैसे क्या ख़त्म किए जा सकते है?

भारतीय प्राचीन इतिहास वर्णवादी रहा है, समाज पर उसके विपरीत परिणाम गिरे, जिससे देश में विषमता बड़े पैमाने पर फैली है. मनुस्मृति यह हिन्दुधर्म का ग्रन्थ है, उसका कठोरता से पालन किया गया. जैसे अंग्रेजो ने भारत का शोषण किया वैसे ही हिन्दुधर्म के सवर्णों ने भी अवर्णों का शोषण ही किया है. इतना ही नहीं तो सवर्णों ने सवर्ण शूद्रों का भी शोषण किया है. शोषण का मतलब गैरफायदा उठाया. 

मनुस्मृति के निम्नांकित विचारों से पता चलता है की भारत में विषमता कैसे फैली? जो शोषण में सहाय्यक रही है. “ईश्वर ने ब्राह्मण का धर्म/कार्य पढ़ना और पढ़ाना, यज्ञ करना व कराना तथा दान देना और लेना निश्चित किया है. क्षत्रिय का धर्म रक्षा करना, दान देना, यज्ञं कराना, पढ़ना और संस्कारित रहना. वैश्य का धर्म है, सूद खाना और खेती करना, पढ़ना, व्यापार करना. शुद्र का केवल एक ही धर्म है, अपने से ऊँचे वर्णों की श्रद्धा के साथ सेवा करना.” (१, ८७, ९१). 

आर्थिक विषमता जबरन फ़ैलाने के लिए मनुस्मृति में ईश्वर के नाम पर ब्राह्मणों ने लिखा, “ब्राहमण शुद्र (सवर्ण हिन्दू) की संपत्ति को बिना संकोच ले (हड़प) सकता है. क्योंकि वह किसी सम्पत्ती का मालिक नहीं होता. जो कुछ सम्पत्ती उसके पास है, वह उसके स्वामी (ब्राह्मण) की है.(८, ४१७). वास्तव में शुद्र को सम्पत्ती इकठ्ठा करते देखकर ब्राह्मणों को दाह उत्पन्न होती होता है. (१०, १२९).

अंग्रेज भारत आए, उन्होंने जुल्मी कानून बनाए, उन्होंने भारत को लुटा है, वे अन्यायी है, एक समुदाय ने दुसरे समुदाय के साथ लुट करना गल्त है तो उन्हें भारत से उनके देश में भगाने के लिए सन १८५७ से १९४७ तक जंग चडी गयी. जिन लोगों ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई तो उनसे अन्यायी होने की अभिलाषा कोई व्यक्ति या समाज कर सकता क्या? फिर भी जिन्हें हमने न्यायी समझा उन्होंने ही विषमता के आधार पर मनुवादी आर्थिक परिणाम कैसे क्या लागु किए? भारतीय संविधान के माध्यम से उसे सही करार कैसे क्या दिया गया? मनुस्मृति के विषमतावादी परिणाम भारतीय संविधान के “धारा-३१” में स्वीकार क्यों किए गए? 

मनुस्मृति ने देश में विषमता को जन्म दिया. उससे समाज में भाईचारा ख़त्म हुआ, देश विविध गुटों में बंट गया. भारत में अगर अंग्रेज का शासन गल्त था तो मनुस्मृति का शासन सही कैसा था? अंग्रेजो के विषमता वादी परिणामो को मिठाने के लिए उनके सम्पत्ती पर धावा बोला और उनकी पूरी सम्पत्ती अपने कब्जे में ली गयी. फिर मनुस्मृति के कानून के तहत जिन लोगों/वर्गों ने लुट मचाई और शुद्र, अतिशूद्र हिन्दुओ को लुटा, उन्हें लाचार बनाया, शोषण किया, अपाहिज बनाया, अपमानित किया गया. अब उस गुटों के ९०% लोग गरीबी में जीवन यापन कर रहे है, कुपोषित है, फांसी लगा रहे है, तो उनके साथ संविधान में न्याय हुआ है? देश में संविधान के धारा -३१ ने मनुस्मृति के माध्यम से लुटे गए सम्पत्ती को उचित, सही करार कैसे क्या दिया है? यह कारनामा संविधान सभा में बहुमतों में उपस्थित कांग्रेस के मनुवादियों ने किया, उसे आझादी के बाद भी शासन, प्रशासन, न्यायाधीश और प्रिंट मिडिया ने सही करार कैसे क्या दिया है?

भारत में जाती व्यवस्था को जड से उखाड़ना चाहते है तो सबसे पहले उसके परिणामो को हटाना पड़ेगा. यानि जो सम्पत्ती उच्च वर्णीय लोगों ने धर्म/मनुस्मृति के नामपर लुटी है, उसे सरकार ने अपने कब्जे में लेनी चाहिए. अर्थात ‘धारा-३१’ को निष्प्रभ करना चाहिए. व्यक्ति को सम्पत्ती धारण करने के उनके संविधानिक मुलभुत अधिकारों को ख़त्म करना चाहिए, क्योंकि उनके पास अभी जो सम्पत्ती है, वह मनुस्मृति के कानून का परिणाम है, और जिनके पास सम्पत्ती नहीं वह भी मनुस्मृति के कानून का ही परिणाम है. संविधान की धारा-२५ व्यक्ति को धर्म पालन का अधिकार देती है, उसके तहत जातिप्रथा को भी पालन करने की इजाजत मिलती है, क्योंकि वह हिन्दू धर्म का ही एक हिस्सा, भाग है. धर्म के नामपर जातिप्रथा को बढ़ावा मिल सकता है, इसलिए इस धारा-२५ को भी निरस्त करना चाहिए. 

जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देनेवाले कानून को यानि धारा-२५, जातिगत आर्थिक भेदभाव को सही साबित करनेवाली धारा-३१ को तथा जातिगत आरक्षण की पेशकश करनेवाली धाराए- ३४०, ३४१ तथा धारा-३४२ को भी निरस्त करना चाहिए, इसमें से एक भी धारा अगर संविधान में रहेगी तो जातिप्रथा का अंत करने का मनसुभा कभी भी कामयाब नही हो सकता. जातिवाद रोखने के लिए सभी प्रयोग अधूरे के अधूरे ही रहेंगे. इतना ही नही तो देश मुट्टीभर लोगो के गुलाम रहेंगे, जो वे नहीं रहना चाहते है, जिस वजह से देश में ‘नक्षलवाद’ फ़ैल रहा है, वह उसका जीता जागता सबूत है.

भारत में राजसत्ता में केवल जनतंत्र है पर अर्थ, शिक्षा, संकृति में मनुस्मृति की ही जोरदार पकड़, शासन है. उसे ख़त्म किये बगैर देश में संविधान का सही में अमल नही देखा जा सकता है. संविधान एक दिखावे के लिए रह जायेगा. संविधान का उद्द्धेश देश में आर्थिक जनतंत्र यानि आर्थिक समता स्थापित करना है. संविधान को चलनेवाले लोग स्वार्थी, भ्रष्ट और मनुवादी है. वे अपने गैर जिम्मेदारी से जबतक बाज नहीं आते तबतक जनता का हाल ही हाल होना तय है. केवल पार्टी बदलने से नहीं तो उनके बुरे सोच को भी बदलना पड़ेगा, क्योंकि यह गलत विचार हर पार्टियों में पाए जा रहे है. भारत में कोंसी पार्टी है, जो पूंजीवाद को पसंद नहीं करती? जो पार्टी पूंजीवाद को सही समझती है वह गरीबों का हित कैसे क्या कर सकती? नेवला और साप एक ही साथ नहीं रह सकते क्योंकि वे परस्पर दुश्मन है, वैसे ही अमीर और गरीब एकसाथ लम्बे समयतक नही रह सकते. उनमे जंग जरुर होगी जो देश के जनतंत्र को जला देगी. 

जो भारतीय लोग जाती, धर्म, प्रान्त, भाषा, लिंग के नामपर विभक्त है, एक नही है, फिर भी एक होने का नाटक करते है. वे क्या परदेशी आतंकी ताकतों से जंग जित सकते है? केंद्र के पास देश के जनता को सुखी करने के लिए उचित धन-सम्पत्ती नही है, जिसका जीता-जागता उदहारण है, उत्तराखंड प्राकृतिक आपदा. सरकार लोगों के सामने भिक मांगते हुए नजर आयी. संविधान के “धारा -३१” का एह हलकट परिणाम है. विश्व का महान जनतंत्र भिकारी है. 

क्या भिकारी सरकार कल्याणकारी हो सकता? अगर यही सही है तो इस देश में लोग बेरोजगार क्यों है? कुपोषित क्यों है? देश में अमीरी-गरीबी है, यह मनुस्मृति की उपज है. अमीर और गरीबों के लिए समान संधि भी रखी जाए तो वह कोई बुद्धिमानी कदम नहीं है. अमीर ही उस संधि को खा बैठते है क्योंकि वे आर्थिक स्थरपर सक्षम, मजबूत, साधन संपन्न है. जित के लिए उनके पास पर्याप्त साधन है. जिनके पास (मनुस्मृति के धारा-८, ४१७ कर तहत) साधन नहीं है, उनके साथ साधन सम्पन्न लोगों को दौड़ाने का प्रयास अन्यायी है. इससे जनतंत्र को बल नही तो दुर्बलता प्राप्त होगी. 

देश में संधि की समानता नहीं तो अस्सल, निर्मल, शुद्ध ‘समानता’ ही चाहिए. संधि की समानता यह कोई जनतंत्र का अंग नही है. जनतंत्र का अंग ‘समानता’ है, जो न्याय, स्वतंत्रता, ‘समानता’ और बंधुता इन चार अंगो में से एक है. जातिगत मनुवादी आर्थिक परिणामो का देश से निष्कासन किए बिना देश में सुख-समृद्धि बहाल होना असंभव है. जातिवाद को रोखने के लिए केवल जातिगत सभाओ पर पाबंधी लगाना ही पर्याप्त प्रयास नहीं है, वह सिर्फ एक ही कदम है पर और भी कदम आगे “आर्थिक जनतंत्र” की मंजील है. राजकीय जनतंत्र के मंजिल को हासिल करने के लिए और भी कुछ कदम बलपूर्वक चलने की जरुरी है. केवल मुट्टीभर लोगो का सुख यानि देश के सभी लोगो का सुख नही है. मनुवादी समाज के केवल एक ऊँगली का आप्रेशन करने से नहीं होगा तो, पुरे समाज का ही आप्रेशन तुरन्त करना जरुरी है.

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

भारतीय जनतंत्र और जातिवादी धोरण

शाहू महाराज के बारे में बीएसपी क्यों ज्यादा प्रचार कर रही है? महाराष्ट्र में अम्बेडकरी/ महार/बौद्ध जातियों से ज्यादा वोट मराठो के है, जो अभी ‘शिवधर्म’ के पास है. मराठे लोग शाहू महाराज को अपना राजा मानते है. अगर मराठो के वोट लेना है तो छत्रपति शाहू महाराज जिस जाती, वर्ण के है, चाहे फिर वे जातिवादी, वर्णवादी क्यों न हो, उनके स्मारक  को मुद्दा बनाया जाए. यह माया की जातिवादी निति है. 

अपने पार्टी के हितों में वह देश में जातिवाद बढ़ाना चाहती है. देश हितो से पार्टी हित उन्हें महान लगता है. यह उनका जातिवादी कदम राष्ट्रिय हितों के विपरीत है. जिसका हमेशा निषेध होते रहना जरुरी है. शाहू महाराज के जीवनी को मै इसलिए यहाँ पर देना उचित समझता हूँ की, उन्होंने अपने जीवन में कोण कोंसे महान कार्य किए है? जिसे इतना कुछ हवा दिया जा रहा है. उनकी जीवनी निम्नप्रकार से रही है...

छत्रपति शाहू महाराज (उर्फ़ यशवंत जयसिंग घाटगे) के नाम जा जन्म २६ जुलाई १८७४ में हुआ था, उन्हें उम्र के ७ वे साल दत्तक लिया गया था. उनके पिताजी का देहांत २० मार्च १८८६ में हुआ, उससमय शाहू महाराज केवल १२ साल के थे. उनकी महाविद्यालय शिक्षा (सन १८८६-८९ में) राजकोट (सौराष्ट्र) के राजपरिवार में हुयी. उन्होंने १८८८ में कोल्हापुर–मिरज रेलवे मार्ग का निर्माण किया. सन १८८९ से १८९३ तक यानि लगबग चार साल तक एस.एम्. फ्रेजर (अंग्रेज) के मार्गदर्शन में विदेशी शिक्षा हासिल की. दिनांक १ एप्रिल १८८९ में उनका ब्याह हुआ. 

कोल्हापुर में लार्ड हेरिस के हातों से दिनांक २ एप्रिल १८९४ में उनका राज्यभिषेक हुआ. सन १८९७ में उन्हें पहला पुत्र प्राप्त हुआ. सन १८९९ से १९०५ तक उन्होंने (ब्राह्मनेत्तर) वेदोक्त आन्दोलन चलाया. सन १९०१ में उन्होंने ब्राह्मण जाती के लिए स्वतंत्र छात्रावास की निर्मिती की. उनके प्रशासन में दिनांक २६ जुलाई २०२६ को उन्होंने मराठो के लिए ५०% जातिगत आरक्षण की घोषणा की और ३% ब्राह्मणों के लिए बाकी ५०% रखी थी. 

हर राज्य में ज्यादातर लगबग १५% ही प्रशासकीय रिक्त पद होते है, यह भी बाते ध्यान में रखना चाहिए. शाहू महाराज के प्रशासन में एक भी महार जाती का व्यक्ति न मास्टर था और न पटवारी, पर ‘चमार’ जाती के कुछ मास्टर जरुर थे. तो अंदाजा लगाना चाहिए की अछूतों के लिए उनके राज्य में कितने प्रतिशत जातिगत आरक्षण था? शाहू महाराज जैसे उच्चवर्णीय हिन्दुओ ने भिक के रूप में जातिगत आरक्षण लागु किया और से पिछड़े जोतिवादी लोग अपना अधिकार समजकर उसे छोड़ना नहीं चाहते, धन्य हो बीएसपी का जातिवाद !

सन १००८ में शाहू महाराज के रास्ते पर बम रखा गया था, पर वे उसमे बच गए. सन १०१० में उन्हें मारने के लिए धमकिया आने लगी तो वे चिंतित रहने लगे. शाहू महाराज ने सन १८१८ में कोल्हापुर में ‘आर्य समाज” (चातुरवर्ण्य) की स्थापना की थी और कहा था, “मै ह्रदय से खुद आर्य समाजवादी हु.” उन्होंने कोल्हापुर के शंकराचार्य पीठ पर डा. कुर्तकोटी की नियुक्ति की थी. 

शाहू महाराज ने दत्तोबा पवार के जरिए मुम्बई में बाबासाहब आंबेडकर से भेट की. उनके मूकनायक पत्र के लिए २५००/- रूपये की मदत की और उनके बारिस्टरी शिक्षा के लिए शिष्यवृत्ति भी दी थी. दिनांक २२ मार्च १९२० में खेतिहर मजदूरों को न्याय दिलाने हेतु मानगाव (जिल्हा-कोल्हापुर) में परिषद का आयोजन हुआ. उसमे वे अध्यक्ष थे और बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर प्रमुख मेहमान और मार्गदर्शक भी थे. महार वतन (सिर्फ ४ आर जमीन की मलकीयत थी, जिसमे गावों की सुरक्षा करने के काम थे पर उनका अनिश्चित मुहवाजा था, जिसमे न सही ढंग से पेट भरता था और न बदनपर वस्त्र, उसमे जातिगत गुलामगिरी के शिवाय और कुछ भी नही था.) कानून ख़त्म करने के आग्रह के बाद उन्होंने एक माह के अन्तराल में महार वतनदारी कानून ख़त्म करने का कानून जारी किया. 

कानपूर, उत्तर प्रदेश के कुर्मी लोगों ने उन्हें १९ अप्रैल १९१९ को सन्मानपूर्वक वैदिक “राजर्षि” पदवी बहाल की. उसमे उनका लम्बा, वैदिक, ऐतिहासिक भाषण हुआ. उसमे उन्होंने लोगों को बताया की आर्य समाज के सभासद बने. वैदिक चतुरवर्ण्य व्यवस्था का पालन करे. अंग्रेज सरकार के साथ हमदर्दी रखे. आखिर दिनांक ६ में १९२२ को उनका मुंबई के ‘पन्हाला अतिथि गृह’ में निधन हुआ और कोल्हापुर के “श्री. शिवाजी वैदिक महाविद्यालय’ के विद्यार्थियों के जरिए वेदोक्त मंत्रोच्छारण से पंचगंगा नदी के किनारे पर उनके शरीर अवशेषों का विषर्जन किया गया. ऐसा उनका वर्णवादी, जातिवादी कार्यकाल रहा है.

बीएसपी यह चमार जाती को एक कामयाब जाती दिखाना चाहती है, जिसका तानाशाह चमार ही रह सकता, अन्य जाती, वर्गों के लिए उसमे सिर्फ झंडे और डंडे उठाने के अलावा और कोई भी दूसरा काम बाकी नहीं है, बीएसपी तानाशाह, कुंवारी मायावती ने ब्राहमणवादी सतीशचंद मिश्रा से दोस्ती चालू की है, चमार जाती के हितों में योजना बनाना है, उसे लागु करना होगा तो उनकी शंख बिना बजे नहीं किया जाएगा. यानि शंख सतीशचन्द्र मिश्रा बजाएगा, उसके बाद ही मायावती/बीएसपी का हाथी चलते जायेगा. 

जाती अभिमान, गर्व के कारण ही सन २०१२ में नागपुर के ‘कस्तूरचंद पार्क’ के सभा में मायावती ने एहलान किया था की, अगर उनकी सरकार महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ होती है तो वह  कोल्हापुर में १०० एकर जमीन पर “छत्रपति शाहू महाराज स्मारक” बनाएगी. मराठो के वोट बीएसपी को नही जाने चाहिए. इसलिए कांग्रेस कमिटी के राजनेताओ ने उनके स्मारक के लिए पहल सुरु की है. 

जातिगत वोटों के दबाव में आकर कांग्रेस भी सरकार चला रही है. अगर मुस्लिमो ने मुंबई में कसाब का स्मारक बनाने की पेशकश की तो क्या कांग्रेस पार्टी ने उसे भी पूरा करना चाहिए? ऐसे जातिवादी विचारों से देश का जनतंत्र हजारो जातियों के टुकडो में बटने से कोई भी पार्टी नही रोख पायेगी. जातिगत महापुरुषों के पुतले, स्मारक बनाने की दौड़ कहीं तो भी बंद होनी चाहिए और देश के ९०% गरीब जनता को सुखी, समृद्ध, भयमुक्त करने के लिए उचित उपाय योजना कामयाब करने के लिए ध्यान देना चाहिए. 

शाहू महाराज के जरिए उतने बड़े संस्थान में केवल करीब २० छात्रवास जातिगत और उतने ही जातिगत विद्यालयों का निर्माण किया गया, अछूतों के लिए भी एक छात्रालय खोला गया था, जिसमे पर जातिगत भेदभाव के वजह से महार जाती और ढोर जाती के लिए अलग अलग छात्रावासों का निर्माण किया गया. जिसका उद्धेश शाहू प्रशासन के लिए उत्तम गुणवत्ता से परिपूर्ण प्रशासक मिले इतना ही था. नागपुर के “संत रविदास छात्रावास” के चमार जातीय (जातिवादी हिन्दू) लोग भी कांशीराम को चमार जाती का महापुरुष मानते थे, उनका गौरव् भी किया था. नागपुर के प्राध्यापक पि. एस. चंगोले (चमार, बीएसपी के प्रचारक, जिन्होंने अपनी शादी वैदिक पद्धति से की थी.) भी कांशीराम तथा शाहू महाराज को अपने जाती का पुरुष मानते है. 

बीएसपी को जातिवादी पार्टी कहा जा रहा है, जो देश में जातिवाद का जहर घोल रही है. जातिगत गुट, संघटन, पार्टी और उनके सभा, सम्मलेन और प्रचार पर सरकार ने रोख लगानी चाहिए. नहीं तो आतंकवाद, नक्षलवाद के भी ज्यादा खतरनाक जातिवादी जंग ही साबित होगी जो देश के राजकीय जनतंत्र की धज्जिया उड़ा देगी. रोटी-बेटी व्यवहार से भारत का जातिवाद ख़त्म नही होगा, जाती यह एक वैचारिक समश्या है, उन्हें विचारों से ही ख़त्म करना चाहिए. 

महामानव सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के विचारों में वह शक्ति है की जो जाती, वंश, वर्ण, वर्ग के मिथ्या, छद्म अभिमान को जड़ से ख़त्म कर सकती है, पर जरुरत है की उसे उचित ढंग से प्रचारित करने के लिए सरकारने ने प्रावधान करना चाहिए. जबतक भारत बुद्धमय नही होगा, तबतक जाति-भेदभाव का कलंक देश में जारी रहेगा, जो पुरे समाज को और एकबार भिकारी, गरीब और गुलाम बनाएगा. 

विश्व का हर राजा अमीर और पूंजीवादी होता है, जो आम लोगो के शोषित करता है और जीता है, जिसे वह अपना धार्मिक अधिकार बताता है, जो की वह एक गैर, तानाशाही और निराधार धारणा रही है. जिसका समर्थन करने के लिए उनके स्मारक गरीब जनता के लिए प्रेरणा के बजाए सिर्फ तिरस्कार के प्रतिक बन जायेंगे. जातिवादी गन्दी राजनीती से सरकारने बाज आना चाहिए.