शुक्रवार, 28 जून 2013

आर्य बनाम नाग वंश : बामसेफ का गलत प्रचार


आरक्षण का मतलब सुरक्षा है. ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को अपने फायदे के लिए निर्माण किया. वर्ण व्यवस्था जन्म पर निर्भर है. व्यक्ति जिस वर्ण में पैदा होता, उसी में पलता, उसी में दिए हुए कार्य करता तथा वह उसी में मरता है. ब्रह्म के मुख से पैदा हुआ वह ब्राह्मण, बाहू से पैदा होनेवाला क्षत्रिय, जांघो से पैदा होनेवाला वैश्य और पैरों से पैदा होनेवाला शुद्र कहा गया. वर्णवाद जन्म पर निर्भर है. सबसे ऊँचा वर्ण ब्राह्मण, उसके बाद क्षत्रिय, उसके बाद वैश्य (श्रेष्ठ) है और इन तिन वर्णों की सेवा करने के लिए ही शुद्र वर्ण बनाया गया. जिनका वर्ण में समावेश है वे सवर्ण और जिनका वर्ण में समावेश नहीं है वे अवर्ण. अवर्ण में अछूत, भटके और वनवाशी जातियों का समावेश किया गया तथा उसे हिन्दू धर्म का ही हिस्सा समझा गया. चार वर्ण और तिन अवर्ण ऐसे कुल सात गुठों का हिन्दुधर्म बना है.

जन्म के आधारपर पहले वर्ण बने, उन्ही का हिस्सा जन्म के आधार पर ही जाती बनी और जन्म के ही आधारपर वंश का भी गठन हुआ है. ब्राह्मणों ने खुद को द्विज कहा, अर्थात उनके दो जन्म होते है. पहला माँ के कोख से तो दूसरा मुंज होने के बाद. जिसकी मुंज होती है उसे ही ब्राहमण कहते है, जिसकी मुंज नही होती उसे ब्राह्मण नही कहा जाता. ब्राह्मण भारत को मातृभूमि मानते है, इसका मतलब उनकी पितृभूमि कही और जगह पर है, ऐसी उनकी धारणा है. (पर वे गलत है, इसे बाबासाहब ने सिद्ध किया.) वर्ण व्यवस्था के अनुसार सबके काम बांटे हुए है. ब्राह्मणों ने शिक्षा, क्षत्रियों ने रक्षा, वैश्यों ने व्यापार और शुद्रो ने सेवा. सवर्णों को "संपत्ति धारण करने का अधिकार" था पर अवर्णों को नही था. उन्हें सिर्फ लाचारी का जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाता था. काम तो दिया जाता था पर उसका उचित दाम नहीं. 

भारतिय आझादी आन्दोलन के दौरान भीमराव रामजी अम्बेडकर का अछूत जाती में जन्म हुआ जिसका नाम “महार” जाती था. उन्होंने भारतीय समाज व्यवस्था का अध्ययन किया तो उनको समझ में आया की जन्म पर आधारित वर्ण, जाती, वंश प्रणाली ब्राहमण वर्ग के कुछ लोगों ने बनाई है. जिसे उन्होंने अपने सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया है. उन्हें यह प्रणाली अन्यायी लगी, उसे ख़त्म करने के उद्धेश से ही बगावत सुरु की, उनके साथ उनके जाती के लोग भी सहयोग देने लगे, नेतृत्व उभरता गया. आगे बाबासाहब के नाम से उनके लोग उन्हें फुकारने लगे. वे अछूतों के पिता बने. भारत को अंग्रेजो के गुलामी से मुक्ति तो मिलनी ही चाहिए पर उन्हें हिन्दुधर्म के अन्यायी धार्मिक रिवाजों से भी मुक्ति चाहिए थी. राजकीय आझादी के साथ धार्मिक आझादी भी चाहिए थी.

हजारो सालो से जो धार्मिक गुलामी अवर्ण समुदाय पर सवर्ण हिन्दू लोगों द्वारा थोंपी गयी थी, उसे पहले हटाए बगैर भारत को आझाद न मिले, अर्थात अंग्रेजोने अवर्णों को सवर्णों के गुलामी को ढोने के लिए मजबूर नही करना चाहिए. इस मांग को ध्यान में लेते हुए भारतीय कांग्रेस लीग को बताया था की भीमराव अम्बेडकर की मांग वाजिब है. हिन्दू धर्म का जातिगत सवर्ण बनाम अवर्ण का झगड़ा आपस में बैठकर पहले समेट लो, उसके बाद ही भारत को आझादी मिलेगी. सवर्णों के राजकीय नेता मोहनदास गांघी थे पर धार्मिक नेता मदन मोहन मालवीय थे. बाबासाहब अम्बेडकर ने किये राजकीय मांगो के विरोध में पूना के येरवडा जेल में गाँधी ने आमरण अनसन सुरु किया और २४ सप्टेम्बर १९३२ को छोड़ा.

सवर्ण हिन्दू डर गए, वे अवर्णों के खिलाफ और भी आक्रोशित हो गए. बाबासाहब को भी जान से मारने की धमकिया आने लगी. उनकी पत्नी रमाबाई भी काफी घबरा गई थी. गाँधी के प्राण रक्षा के लिए सवर्णों ने बाबासाहब से भिक मांगना सुरु किया था. ज्यादा अपने मांगो/घटना को लम्बा खीचा जाए तो वह टूट भी सकती है, अनर्थ भी हो सकता इसलिए 'माध्यम मार्ग' को अपनाया. जो भी ठराव सवर्णों ने ठहराया था उसपर बाबासाहब ने गाँधी के प्राण बचने चाहिए और उनपर गाँधी के प्राण लेने के ऐवज में किसी ने भी दोषी नही समझाना चाहिए इसी बातों को ध्यान में रखकर समझौते पर सही की. ठराव बनाया था सवर्णों ने उसे सही करके सिर्फ स्वीकार किया अवर्णों ने. यानि जाती के आधारपर राजकीय आरक्षण देने का प्रस्ताव सवर्णों का था, उसे बाबासाहब को दोषी धरना अनुचित है. यह आरक्षण जनसँख्या के अनुपात में था. यह केवल सत्ता में भागीदारी का आरक्षण था जिसमे सिर्फ संविधान लागु होने के बाद सिर्फ १० साल तक ही देने का वादा किया गया था. 

शिक्षा और प्रशासनिक स्तरपर लागु करने की वकालत बाबासाहब ने नही की थी. क्योंकि उन्हें पूरी उम्मीद थी की वे संविधान को आदर्श बनाने के लिए कांग्रेस के संविधान सभा के सभासदों को मनाने में कामयाब होंगे और भारत में "आदर्श जनतंत्र" बहाल कर पाएंगे. जिसमे केवल अवर्णों के ही हितों की देखभाल नही होगी तो सभी भारतियों का कल्याण होगा. पर वे कांग्रेस के वर्णवादी राजकीय नेताओ को मनाने में वे कामयाब नही हुए. तब वे भी डर गए. उन्होंने संविधान सभा पर बहिष्कार किया. लगातार तिन दिन तक वे संविधान सभा से दूर रहे. कांग्रेसी नेताओ को भी डर लगा, कही ऐसा तो न हो की बाबासाहब अंग्रेजों पास "पूना समझौते" का पालन नही किया गया, तो वे सिकायत करेंगे. अंग्रेज आझादी सौंपने के लिए और भी समय न लगा दे. तथा यह भी हो सकता है की बाबासाहब संविधान बनने के पहले ही लोगों को कांग्रेस के खीलाफ भड़का न दे, उससे देश में काफी गड़बड़ी हो सकती थी. 

कांग्रेस बाबासाहब को केवल अछूतों के ही प्रतिनिधि मानती थी, जब भी वे अन्य गुठों के हितों की वकालत किया करते थे तो "संविधान सभा" में आपत्ति ली जाती थी और उन्हें चुप किया जाता था. जब पूना समझौतों में किये वादे पूरा करने में उन्होंने संविधान सभा में बहुमत साबित करने के लिए सहयोग देने का वादा किया तभी ही बाबासाहब संविधान सभा के कामकाज में सम्मिलित हुए और पूना समझौते के सवर्णों के वायदों के मुताबिक भारतीय संविधान में राजकीय आरक्षण मंजूर किया गया. “फुल (आर्थिक, आदर्श जनतंत्र) नही तो, फुल की पगडण्डी (राजकीय जनतंत्र के साथ जातिगत आरक्षण) ही सही,” ऐसा मानकर बाबासाहब ने दम लिया. उनके मर्जी और बुद्धी के अनुसार संविधान की हर एक धारा नही बनी और न बन भी सकती थी क्योकी धाराए एकमत से नही तो बहुमतों से बनती थी. 

भारतीय संविधान के तहत उन्होंने केवल “एक व्यक्ति, एक मत” के राजकीय जनतंत्र को ही बहाल करने में अपनी कामयाबी मानी पर उसपर वे संतुस्टता मानने को तयार नही थे. आजादी के बाद भारत में “एक व्यक्ति, एक मूल्य” के “आर्थिक/आदर्श जनतंत्र” के बहाली की वे कामना करते रहे, पर वह मांग उनके जीते जी पूरी नही हो सकी, जिसके वजह से वे देहातों में रहनेवाले खेतिहर मजदूरों के हालात को लेकर उनके निजी सहयोगी, नानकचंद रट्टू के पास खेद भी प्रकट कर चुके थे. 

बाबासाहब जाने के बाद पढेलिखे लोग जो पुरे के पुरे बामसेफ संघटन के तहत अपना तन, मन, धन देने लगे और जातिगत प्रशासनिक और राजकीय मांगो को आगे बढ़ाते रहे. जाती से ही जाती मिट सकती, इस विचार से बामसेफ ने पिछड़े जातियों के सरकारी कर्मचारियों को संघटित करना सुरु किया, कर्मचारियों में की गयी जाग्रति को सामाजिक जाग्रति का नाम दिया गया, जो गलत था. उनके कर्मचारियों के संघटन के नेता लोग राजकीय आन्दोलन करने चले गए, उन्होंने बीएसपी नाम की पार्टी गठित की और सरकारी कर्मचारी उन्हें मदत करते गए.

बामसेफ ने पिछड़े जातियों को जोड़ा, पर तोडा नहीं. जाती को तोड़ने के लिए “अन्हीहिलेसन आफ कास्ट” का हवाला भी दिया गया, जिसमे जाती जोड़ने पर नही तो तोड्ने पर जोर दिया था. जाती जोड़ने के ही कार्य को वे जाती तोड़ने का कार्य करके पेश करते रहे. लेकिन हकीकत एक न एक दिन तो सामने आती ही है. अब यह बात भी सिद्ध हो चूकी है, कांशीराम ने ही कहा था की 'जाती तोड़ने का कार्य असंभव है, उसे हम नही कर सकते, हम जातियों को जोड़ने का ही कार्य करते रहेगे.'

स्वर्गीय कांशीराम ने "बहुजन" का नारा दिया, जो ८५% लोगों के लिए प्रयोग में लाया गया, जो सिर्फ और सिर्फ जातीवाद के आधार पर ही निर्भर था. उससे भी आगे जाकर कांशीराम के नारे को ख़ारिज करते हुए. वामन मेश्राम ने मूलनिवासी का नारा दिया. इसमें ब्राह्मण जाती को छोडके सभी जातीयों का समावेश किया गया. आर्य वंश के लोग विदेशी है, भारतीय नहीं, जिसमे सिर्फ ब्राह्मण लोग ही आते है. आर्य वंश के लोगों ने भारत के मुलनिवाशी लोगों हराया और उसे गुलाम बनाया, उसे दास, दश्यु, असुर, शुद्र, "नाग" कहा गया. इस प्रकार की वल्गना की गयी. आर्य विदेश से कौनसे साल आए? क्या नाग लोग साप के पेठ से पैदा हुए, जिसे नाग समझा गया? ब्राहमण और बामसेफ अगर आर्यों को जन्म के आधारपर स्वीकार करते है तो नाग को किस आधार पर स्वीकार करते है? जन्म के या गुणों के? अगर नाग वंशीय होने के सबूत गुण के आधारपर है तो आर्य होने के सबूत वंश के आधारपर क्यों ? 

अभी भारत आझाद है, भारतिय संविधान के आधारपर जिसका जन्म जिस गाव में हुआ वह उस गाव का मुलनिवाशी होता है. क्या संविधान के अनुसार मुलनिवाशी को वंश के आधारपर स्वीकार करना चाहिए? या केवल बामसेफ कहती है इसलिए उसके कहने पर मुलनिवाशी या विदेशी ठहराना चाहिए? बुद्ध का धम्म विश्व में फ़ैलाने का बाबासाहब का सपना था. तो क्या भारतीय धम्म को देसी/विदेशी के मुद्यो के आधारपर बाहार देश के लोग भी नही नकार सकते? बाबासाहब ने अपने संघटन में ब्राह्मणों का भी स्वागत किया था, बुद्ध ने भी उनका स्वागत किया, फिर बामसेफ के झंडूबाम लोगों को ही क्या हुआ? बाबासाहब ने ब्राह्मणवाद को यानि उनके उंच/नीच के विचारों को विरोध किया, न की उन जाती के व्यक्तियों को... जेधे-जवलकर के प्रस्ताव को बाबासाहब ने क्यों नकारा था? बाबासाहब ब्राह्मणों के खिलाफ नहीं थे, वे सिर्फ ब्राह्मणवाद के खीलाफ थे. पर बामसेफ ब्राह्मणवाद को स्वीकार करती है और ब्राह्मणों को नकार रही है, क्या यह अम्बेडकर विरोधी विचार नही है? 

बामसेफ और बीएसपी जातिगत आरक्षण की पेशकश करती है. क्या यह उनका कदम जातिवादी नहीं है? जातिगत प्रशासनिक आरक्षण से केवल ९.७% लोग ही लाभान्वित हो सके, बाकि लगबग ९०% पिछडो का क्या? वे जब रोजगार के लिए सरकारी कर्ज मांगने जाते है तो उन्हें दो गारंटर मांगे जाते, बैंक उसके बगैर कर्ज नही देती. ९०% लोगों को गारंटर ही नही मिलते और वे वापस घर लौट आते, तो दुबारा कर्ज के लिए बैंक जाना उचित नहीं मानते. केवल सरकारी कर्मचारियों के हितों के लिए ही अगर संघटन को चलाया जाता है तो उसे समाज जाग्रति कर उन्हें लाभान्वित किये जाने के बारे में सहाय्यक कहा जाता, यह बाते कहातक नही है?

बामसेफ/ बीएसपी झूट के पुलिंदे के शिवाय और क्या है? अगर वे सही होते तो कोर्ट में चक्कर क्यों लगाते? एस ऍफ़ गंगावने/ बी डी बोरकर के नजर में वामन मेश्राम चोर, झुटा, बदमाश नही होता तो उन्हें संघटन से बाहार जाने की क्या जरुरत थी? डीएनए रिपोर्ट का हवाला देते हुए, आर्य विदेशी है ऐसा कहा जाता है. यह रिपोर्ट शरीर से सम्बंधित होती है, जिसमे ९९.९ % समानता होती है. इसका मतलब हर विश्व का इंसान एक दुसरे का भाई है, दुश्मन नही. अगर कोई दुश्मन भी बनता है तो वह वैचारिक मतभेदों के द्वारा ही बनता है, जिन जिन बातों मतभेद है उसे अगर विचारो द्वारा ही खलास किये गए तो क्या हर्जा है? 

महामानव बुद्ध ने भी इसके अलावा और क्या किया, उन्होंने भी तो ब्राह्मणवाद से निपटने के लिए बुद्धि का ही उपयोग किया. उसी के आधार पर उनके संघ में ७५% ब्राह्मण जाती के भिक्षु थे. अगर ब्राह्मणों को मारा भी गया तो उनके विचार जिन लोगों के दिमाग में घुसे हुए है, तो वे जाती के आधारपर भेदभाव नहीं करेंगे? तो क्या उन्हें भी देश से भगाना चाहिए? बौद्धिक मुजोरी को बुद्धिमानी नही कहा जा सकता, वह एक प्रकार का पागलपन ही है. बौद्धिक भ्रष्टाचार है. अगर जातिवादी पागलपन को नही रोखा गया तो वह जातिवादी आतंक भी फैल सकता, वंशवाद भी आतंकित हो सकता. भारतीय जनतंत्र के सेहत के लिए किसी भी प्रकार का भेदभाव बहुत घातक है. अम्बेडकरी लोगों ने किसी भी प्रकार के आतंकवादी विचारों से दूर रहना चाहिए. नही तो बुद्ध और बाबासाहब के नाम को बदनाम करने और धोका देने का आरोप उनपर भी लग सकता है.

बुधवार, 26 जून 2013

शुद्र पूर्वी कोण होते?.... उत्तर - शुद्र पूर्वी "आर्य" होते.

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या "शुद्र पूर्वी कोण होते?" या ग्रंथात “आर्य” हे विदेशी नसून देशी आहेत असे लिहिले असतांना त्यांच्या विचारांवर मात देण्यासाठी "मूलनिवासी" मोहिम हाती घेतली. जनता "जयभीम" म्हणत असतांना त्यांना "जय मूलनिवासी" म्हणायला शिकवीणे हे आम्बेडकर प्रेमी असण्याचे धोतक नाही. हे माथेफिरू लोक बाबासाहेब आम्बेडकर यांच्या द्वितीय विवाहाला वादाच्या भोवऱ्यात अडकवून ते माईसाहेब ह्या चरित्याहीन होत्या असे समजावून देवू पाहत आहेत.

डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर यांचे विचार चुकीचे होते हे सिद्ध करण्यासाठी "ब्राह्मण कन्या ह्या विष कन्या असतात, त्यांच्याशी विवाह करणारे मुर्ख आहेत” या विचारांचा प्रचार वामन मेश्राम नावाच्या माथेफिरुने सुरु केला आहे. आंतरजातीय विवाहाने आमच्या चळवळीचे फार मोठे नुकसान झाले असा खोटा आरोप यांनी चालविला आहे. स्त्रियांना दोषी समजण्याचा हा प्रकार आहे. सर्व स्त्रियांनी या विचारांचा धिक्कार करायला पाहिजे. ही मनुवादी विचारसरणी आहे. जातीच्या आधारे स्त्रिया वाईट ठरविणे चुकीचे आहे. या आधी पुणे करारावर सही करणारे गुन्हेगार सांगुन बाबासाहेब यांचा "धिक्कार" करणारी मोहिम चालविली होती.

बाबासाहेब यांनी माईसाहेब यांच्याशी केलेला विवाह हा बाबासाहेब यांच्यावर लादलेला विवाह होता असा खोटा प्रचार चालू केला आहे. बाबासाहेब हे ब्राह्मनांच्या फाश्यात अडकले होते म्हणजे ते ब्राह्मण लोकांपेक्षा किती निर्बुद्ध होते? असे सिद्ध करण्याचा हा यत्न आहे. बाबासाहेब यांनी त्यात कायदेशीर आंतरजातीय विवाहाला स्वतः पासून सुरुवात केली आणि मुख्य म्हणजे बाबासाहेब हे मधुमेह नावाच्या जर्जर आजारांनी ग्रस्त होते, त्यामुळे डाक्टर लोकांनी त्यांना मिनमिनत्या पंथिची उपमा दिली होती. बाबासाहेब यांनी स्वतः आपल्या डॉ. राव नावाच्या मित्राच्या मदतीने सविताला स्वताच्या प्रेमात पाडून घेतले होते. डॉ. सविता यांनी बाबासाहेब यांच्यासी जो विवाह केला तो म्हणजे बाबासाहेब यांच्यावर वैद्यकीय मदतीसाठी केलेला उपकाराच ठरला. हा विवाह जातीयवादी नव्हता तर तो जाती मोड्न्याचा होता. यात बाबासाहेब यांनी एकाच निर्णयात कितीतरी उद्धिष्ट गाठले होते, हे लक्षात घेण्यासारखे आहे.

बाबासाहेब आम्बेडकर "द बुद्ध एंड हिज धम्म" या ग्रंथाच्या "प्रस्तावना" या ठिकाणी लिहितात की डॉ. मालवंकर आणि डॉ. सविता कबीर यांची वैद्यकीय मदत झाली नसती तर त्यांना धम्म ग्रन्थ लिहिता आला नसता म्हणून त्यांच्या सेवेबद्दल बाबासाहेब यांनी आभार मानले, हे लक्षात घेण्यासारखे आहे. अड़. प्रकाश आम्बेडकर (बाबासाहेब यांच्या नातवाने) ब्राह्मण मुलीशी विवाह केला हा फार मोठा गुन्हा केला हे सिद्ध करण्याचा जातीयवादी प्रयत्न लावून धरलेला आहे. त्याऐवजी माझे स्वताचे नेतृत्व किती अफाट आहे असे दाखवून प्रौढी मारण्याचा हा प्रयत्न आहे.

हुकुमशहा वामन मेश्राम हा एक माथेफिरू आहे. बामसेफ संघटनेचा अध्यक्ष असल्याचा खोटा प्रचार करीत आहे. हे सर्व गैर प्रयत्न का करतोय? या प्रश्नाचे उत्तर म्हणजे डोळेझाक तानाशाह कांशीराम यांच्या विचारांचे समर्थन होय. जातीयवादी "बहुजन" नावाच्या निर्माण झालेल्या लाटेचा फायदा घेण्याचा आटोकाट प्रयत्न आहे. हे सर्व काही कार्य स्वनिर्मित "भारत मुक्ति मोर्चा" नावाच्या राजकीय पार्टीच्या विजयासाठी आहे. बीएसपी आणि आरपीआय या दोन्ही पक्षांवर मात करण्यासाठी "कु" धडपड चालू झालेली आहे. जनता सर्व ओळखून आहे की कोण खरे बोलत आहे आणि कोण खोटे? आता वामन मेश्राम जनतेला खोटेनाटे पुरावे दाखवित आहे की बाबासाहेब यांच्या मारेकऱ्यानना शिक्षा देण्यासाठी, भावनिक शोषण करण्याचा हा वामन मेश्राम नावाच्या राजकीय हुकुमशाहाचा डाव आहे. सुजान जनतेने यांच्या 'मुलनिवासी" विचार सरणी पासून सावध रहावे.

वामन मेश्राम को बामसेफ का मुखिया किसने किया? और वह कितने साल तक रहेगा? बामसेफ जनतंत्र को मानती है क्या? उसे जातियों का जनतंत्र पसंद है या समाज का? बामसेफ के कुल कितने अध्यक्ष है? और उनके नाम क्या है?

कुणाचे विचार खोडुन काढता आले नाही की त्यांना दलाल, भडवे संबोधने योग्य आहे का? हा बुद्धीमानी प्रकार आहे का? वामन मेश्राम बुद्धिमान असेल तर त्यांनी वरील माझ्या विचारांचे खंडण करून दाखवावे. तो जोपर्यंत तसे करणार नाही तोपर्यंत तरी निर्बुद्ध आहे, असे म्हणण्याशिवाय पर्याय नाही.

अम्बेडकरी मिडिया ?



"२२ प्रतिज्ञा" यह सिर्फ "प्रासंगिक" थी. अभी वह प्रसंग नही रहा इसलिए उसे दोहराने की जरुरत नहीं है. तथा डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने कहीं पर उसे दोहराने को नही कहा है, इतनाही नही तो १२ वि प्रतिज्ञा पुनर्जन्म का स्वीकार करती है, यह बुद्ध धम्म का हिस्सा नहीं है. बोधिसत्व को प्राप्त करने के लिए ही पारमिता के नियम बनाए गए थे, जो १० जन्म तक बोद्धिसत्व के नियमों का पालन करता है वही बुद्ध होता है. 


क्या सिद्धार्थ उनके पहले के पहले १० जन्मतक बोधिसत्व थे? किसने देखा था? बुद्धिज़्म को ब्राह्मण लोगों ने हिन्दुधर्म को बचाने के लिए बौद्ध विचारों में भ्रम फैलाया था, जिसका प्रचार महायान संप्रदाय ने जोरशोर से किया है और अभी भी चालू है. बुद्धिज़्म को बिना जाने उसे मानने की प्रतिज्ञाए लेना मुर्खता के अलावा और कुछ भी नहीं है. 


जिस मुंबई स्थित सोनटक्के साहब (मोबाईल- ०९२०९२६३३३६) ने "२२ प्रतिज्ञा अभियान" फेसबुक पर चलाया था उन्हें ही मैंने दो साल पहले आपत्ति जताई थी मगर उन्होंने मेरे आपत्ति पर कुछ भी गौर से विचार नहीं किया. लार्ड बुद्ध टिव्ही ने भी उसे नवाजा है, क्या लार्ड बुद्ध टिव्ही के मालिक भैय्याजी खैरकर को कुछ दिमाग है या केवल भूसा? आवाज इण्डिया टिव्ही भी और कोनसा धम्म पढ़ा रहा? खुले आम विपस्सना का प्रचार कर रहा है. क्या बुद्ध ने विपस्सना सिखाई थी? महाबोधि चैनल का "ध्यान' क्या है?

भारतीय संविधान यह कान्ग्रेशी उच्च वर्णीय लोगों के संविधान सभा में पास की गयी कृति/ किताब है, जिसमे बाबासाहब के विचार नही तो सिर्फ कांग्रेसी लोगों के विचार है उसे यह चैनल बाबासाहब के विचारों पर होने का दावा करती है, बाबासाहब को संविधान कैसा बनाना था और कैसा बन गया? इनकी उन्हें जानकारी है? 

टिव्ही माध्यम यह दुधारी तलवार है, उनका इस्तेमाल करनेवाले दिमाग अगर निर्बुद्ध है तो उससे फायदे के एवज में नुकसान भी भारी हो सकता है. जो लोग धम्म को बिना जाने ही धम्म प्रचार करने का दावा करते है वे बेफकुफ़ नहीं तो और क्या है? क्या यह टिव्ही चैनलों को प्रयास धम्म को आगे ले जाने का है या पीछे? लोगों के ही चंदे से लोगों को ही मुर्ख बनाना यह कदम कहाँ तक सही है? अम्बेडकरी लोगों ने "बुद्धि"प्रामान्यवादी होना चाहिए या "शब्द" प्रामान्यवादी ?