मंगलवार, 9 जुलाई 2013

भारतीय जनतंत्र और जातिवादी धोरण

शाहू महाराज के बारे में बीएसपी क्यों ज्यादा प्रचार कर रही है? महाराष्ट्र में अम्बेडकरी/ महार/बौद्ध जातियों से ज्यादा वोट मराठो के है, जो अभी ‘शिवधर्म’ के पास है. मराठे लोग शाहू महाराज को अपना राजा मानते है. अगर मराठो के वोट लेना है तो छत्रपति शाहू महाराज जिस जाती, वर्ण के है, चाहे फिर वे जातिवादी, वर्णवादी क्यों न हो, उनके स्मारक  को मुद्दा बनाया जाए. यह माया की जातिवादी निति है. 

अपने पार्टी के हितों में वह देश में जातिवाद बढ़ाना चाहती है. देश हितो से पार्टी हित उन्हें महान लगता है. यह उनका जातिवादी कदम राष्ट्रिय हितों के विपरीत है. जिसका हमेशा निषेध होते रहना जरुरी है. शाहू महाराज के जीवनी को मै इसलिए यहाँ पर देना उचित समझता हूँ की, उन्होंने अपने जीवन में कोण कोंसे महान कार्य किए है? जिसे इतना कुछ हवा दिया जा रहा है. उनकी जीवनी निम्नप्रकार से रही है...

छत्रपति शाहू महाराज (उर्फ़ यशवंत जयसिंग घाटगे) के नाम जा जन्म २६ जुलाई १८७४ में हुआ था, उन्हें उम्र के ७ वे साल दत्तक लिया गया था. उनके पिताजी का देहांत २० मार्च १८८६ में हुआ, उससमय शाहू महाराज केवल १२ साल के थे. उनकी महाविद्यालय शिक्षा (सन १८८६-८९ में) राजकोट (सौराष्ट्र) के राजपरिवार में हुयी. उन्होंने १८८८ में कोल्हापुर–मिरज रेलवे मार्ग का निर्माण किया. सन १८८९ से १८९३ तक यानि लगबग चार साल तक एस.एम्. फ्रेजर (अंग्रेज) के मार्गदर्शन में विदेशी शिक्षा हासिल की. दिनांक १ एप्रिल १८८९ में उनका ब्याह हुआ. 

कोल्हापुर में लार्ड हेरिस के हातों से दिनांक २ एप्रिल १८९४ में उनका राज्यभिषेक हुआ. सन १८९७ में उन्हें पहला पुत्र प्राप्त हुआ. सन १८९९ से १९०५ तक उन्होंने (ब्राह्मनेत्तर) वेदोक्त आन्दोलन चलाया. सन १९०१ में उन्होंने ब्राह्मण जाती के लिए स्वतंत्र छात्रावास की निर्मिती की. उनके प्रशासन में दिनांक २६ जुलाई २०२६ को उन्होंने मराठो के लिए ५०% जातिगत आरक्षण की घोषणा की और ३% ब्राह्मणों के लिए बाकी ५०% रखी थी. 

हर राज्य में ज्यादातर लगबग १५% ही प्रशासकीय रिक्त पद होते है, यह भी बाते ध्यान में रखना चाहिए. शाहू महाराज के प्रशासन में एक भी महार जाती का व्यक्ति न मास्टर था और न पटवारी, पर ‘चमार’ जाती के कुछ मास्टर जरुर थे. तो अंदाजा लगाना चाहिए की अछूतों के लिए उनके राज्य में कितने प्रतिशत जातिगत आरक्षण था? शाहू महाराज जैसे उच्चवर्णीय हिन्दुओ ने भिक के रूप में जातिगत आरक्षण लागु किया और से पिछड़े जोतिवादी लोग अपना अधिकार समजकर उसे छोड़ना नहीं चाहते, धन्य हो बीएसपी का जातिवाद !

सन १००८ में शाहू महाराज के रास्ते पर बम रखा गया था, पर वे उसमे बच गए. सन १०१० में उन्हें मारने के लिए धमकिया आने लगी तो वे चिंतित रहने लगे. शाहू महाराज ने सन १८१८ में कोल्हापुर में ‘आर्य समाज” (चातुरवर्ण्य) की स्थापना की थी और कहा था, “मै ह्रदय से खुद आर्य समाजवादी हु.” उन्होंने कोल्हापुर के शंकराचार्य पीठ पर डा. कुर्तकोटी की नियुक्ति की थी. 

शाहू महाराज ने दत्तोबा पवार के जरिए मुम्बई में बाबासाहब आंबेडकर से भेट की. उनके मूकनायक पत्र के लिए २५००/- रूपये की मदत की और उनके बारिस्टरी शिक्षा के लिए शिष्यवृत्ति भी दी थी. दिनांक २२ मार्च १९२० में खेतिहर मजदूरों को न्याय दिलाने हेतु मानगाव (जिल्हा-कोल्हापुर) में परिषद का आयोजन हुआ. उसमे वे अध्यक्ष थे और बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर प्रमुख मेहमान और मार्गदर्शक भी थे. महार वतन (सिर्फ ४ आर जमीन की मलकीयत थी, जिसमे गावों की सुरक्षा करने के काम थे पर उनका अनिश्चित मुहवाजा था, जिसमे न सही ढंग से पेट भरता था और न बदनपर वस्त्र, उसमे जातिगत गुलामगिरी के शिवाय और कुछ भी नही था.) कानून ख़त्म करने के आग्रह के बाद उन्होंने एक माह के अन्तराल में महार वतनदारी कानून ख़त्म करने का कानून जारी किया. 

कानपूर, उत्तर प्रदेश के कुर्मी लोगों ने उन्हें १९ अप्रैल १९१९ को सन्मानपूर्वक वैदिक “राजर्षि” पदवी बहाल की. उसमे उनका लम्बा, वैदिक, ऐतिहासिक भाषण हुआ. उसमे उन्होंने लोगों को बताया की आर्य समाज के सभासद बने. वैदिक चतुरवर्ण्य व्यवस्था का पालन करे. अंग्रेज सरकार के साथ हमदर्दी रखे. आखिर दिनांक ६ में १९२२ को उनका मुंबई के ‘पन्हाला अतिथि गृह’ में निधन हुआ और कोल्हापुर के “श्री. शिवाजी वैदिक महाविद्यालय’ के विद्यार्थियों के जरिए वेदोक्त मंत्रोच्छारण से पंचगंगा नदी के किनारे पर उनके शरीर अवशेषों का विषर्जन किया गया. ऐसा उनका वर्णवादी, जातिवादी कार्यकाल रहा है.

बीएसपी यह चमार जाती को एक कामयाब जाती दिखाना चाहती है, जिसका तानाशाह चमार ही रह सकता, अन्य जाती, वर्गों के लिए उसमे सिर्फ झंडे और डंडे उठाने के अलावा और कोई भी दूसरा काम बाकी नहीं है, बीएसपी तानाशाह, कुंवारी मायावती ने ब्राहमणवादी सतीशचंद मिश्रा से दोस्ती चालू की है, चमार जाती के हितों में योजना बनाना है, उसे लागु करना होगा तो उनकी शंख बिना बजे नहीं किया जाएगा. यानि शंख सतीशचन्द्र मिश्रा बजाएगा, उसके बाद ही मायावती/बीएसपी का हाथी चलते जायेगा. 

जाती अभिमान, गर्व के कारण ही सन २०१२ में नागपुर के ‘कस्तूरचंद पार्क’ के सभा में मायावती ने एहलान किया था की, अगर उनकी सरकार महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ होती है तो वह  कोल्हापुर में १०० एकर जमीन पर “छत्रपति शाहू महाराज स्मारक” बनाएगी. मराठो के वोट बीएसपी को नही जाने चाहिए. इसलिए कांग्रेस कमिटी के राजनेताओ ने उनके स्मारक के लिए पहल सुरु की है. 

जातिगत वोटों के दबाव में आकर कांग्रेस भी सरकार चला रही है. अगर मुस्लिमो ने मुंबई में कसाब का स्मारक बनाने की पेशकश की तो क्या कांग्रेस पार्टी ने उसे भी पूरा करना चाहिए? ऐसे जातिवादी विचारों से देश का जनतंत्र हजारो जातियों के टुकडो में बटने से कोई भी पार्टी नही रोख पायेगी. जातिगत महापुरुषों के पुतले, स्मारक बनाने की दौड़ कहीं तो भी बंद होनी चाहिए और देश के ९०% गरीब जनता को सुखी, समृद्ध, भयमुक्त करने के लिए उचित उपाय योजना कामयाब करने के लिए ध्यान देना चाहिए. 

शाहू महाराज के जरिए उतने बड़े संस्थान में केवल करीब २० छात्रवास जातिगत और उतने ही जातिगत विद्यालयों का निर्माण किया गया, अछूतों के लिए भी एक छात्रालय खोला गया था, जिसमे पर जातिगत भेदभाव के वजह से महार जाती और ढोर जाती के लिए अलग अलग छात्रावासों का निर्माण किया गया. जिसका उद्धेश शाहू प्रशासन के लिए उत्तम गुणवत्ता से परिपूर्ण प्रशासक मिले इतना ही था. नागपुर के “संत रविदास छात्रावास” के चमार जातीय (जातिवादी हिन्दू) लोग भी कांशीराम को चमार जाती का महापुरुष मानते थे, उनका गौरव् भी किया था. नागपुर के प्राध्यापक पि. एस. चंगोले (चमार, बीएसपी के प्रचारक, जिन्होंने अपनी शादी वैदिक पद्धति से की थी.) भी कांशीराम तथा शाहू महाराज को अपने जाती का पुरुष मानते है. 

बीएसपी को जातिवादी पार्टी कहा जा रहा है, जो देश में जातिवाद का जहर घोल रही है. जातिगत गुट, संघटन, पार्टी और उनके सभा, सम्मलेन और प्रचार पर सरकार ने रोख लगानी चाहिए. नहीं तो आतंकवाद, नक्षलवाद के भी ज्यादा खतरनाक जातिवादी जंग ही साबित होगी जो देश के राजकीय जनतंत्र की धज्जिया उड़ा देगी. रोटी-बेटी व्यवहार से भारत का जातिवाद ख़त्म नही होगा, जाती यह एक वैचारिक समश्या है, उन्हें विचारों से ही ख़त्म करना चाहिए. 

महामानव सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के विचारों में वह शक्ति है की जो जाती, वंश, वर्ण, वर्ग के मिथ्या, छद्म अभिमान को जड़ से ख़त्म कर सकती है, पर जरुरत है की उसे उचित ढंग से प्रचारित करने के लिए सरकारने ने प्रावधान करना चाहिए. जबतक भारत बुद्धमय नही होगा, तबतक जाति-भेदभाव का कलंक देश में जारी रहेगा, जो पुरे समाज को और एकबार भिकारी, गरीब और गुलाम बनाएगा. 

विश्व का हर राजा अमीर और पूंजीवादी होता है, जो आम लोगो के शोषित करता है और जीता है, जिसे वह अपना धार्मिक अधिकार बताता है, जो की वह एक गैर, तानाशाही और निराधार धारणा रही है. जिसका समर्थन करने के लिए उनके स्मारक गरीब जनता के लिए प्रेरणा के बजाए सिर्फ तिरस्कार के प्रतिक बन जायेंगे. जातिवादी गन्दी राजनीती से सरकारने बाज आना चाहिए.

रविवार, 7 जुलाई 2013

शाहू महाराज और वर्णाश्रम धर्म




महाराष्ट्र के कोल्हापुर संस्थान के राजा शाहू महाराज का अन्तकाल ६ में, १९२२ को हुआ. आजसे करीब ९१ साल पहले उनका देहांत हुआ. उन्हें हिन्दुधर्म सुधारक राजाओ के रूप में जाना जाता है. आधुनिक जगत में अनेक सुधारक रहे पर उनके जातिगत आरक्षण निति के वजह से वे ज्यादा ही पहचाने जाते है. आज जो आरक्षण निति चालू है उनके पितामह उन्हें ही समझा जाता है.



शाहू महाराज का नाम यशवंतराव था, उनके पिता का नाम जयसिंगराव उर्फ़ आबासाहेब घाडगे था. वे कागल (जेष्ट) घराने से ताल्लुक रखते थे. उनके उम्र के सातवे साल उन्हें कोल्हापुर के राजगद्दी के वारस के रूप में ‘दत्तक’ लिया गया. सन १८९४ में उनका राज्यभिषेक हुआ. तभी से १९२२ तक यानि करीब ३० साल तक उन्होंने राजगद्दी संभाली थी.


अपने तीस साल के कार्यकाल में उन्होंने ब्राह्मण लोगोने ने विशेषत: बाळ गंगाधर तिलक (पुणे) ने काफी सताया था. उनसे तंग आकर वे ब्राह्मणों के विरोधक बने और उन्होंने “अब्राह्मण आन्दोलन” को बढ़ावा दिया. वर्णवाद, जातिवाद के आधारपर उनका ब्राह्मणों ने विरोध किया तो उन्होंने भी उसी वर्णवादी, जातिवादी के आधारपर ही अपने आन्दोलन की नीव डाली. ब्राह्मण बनाम अब्राहम जंग चालू हुयी. जाती और वर्ण को जन्म के आधारपर उचित/अनुचित समझा जाता उसे बुद्ध, कबीर, फुले और बाबासाहब ने विरोध किया पर पर शाहू महाराज भी ब्राहमणवाद को नही समज सके और उनके जाल में फंस गए.


सुरु में शाहू महाराज छूत-अछुत के बीमारी से ग्रस्त रहे. अछूतों के स्पर्श होने के केवल आभाष से भी वे खुद को पवित्र, शुद्ध होने के लिए नाह लेते. ब्राह्मण द्वेष के कारण अन्य लोगों को अपने प्रशासन में सामिल करने के लिए उन्हें उत्तम सुशिक्षित प्रशासकों की जरुरत थी, उसकी पूर्ति करने के उद्धेश से ही उन्होंने शिक्षा संस्थानों यानि जातिगत २० हॉस्टल और लगबग उतने ही पाठशालाओ की निर्मिती की थी.


शाहू महाराज के संस्थान में ३% ब्राह्मणों को ५०% आरक्षण था और बाकि ९७% लोगों में से केवल मराठो के लिए ५०% जातिगत आरक्षण था. बाकि तेली, तम्बोली, जैन, लिंगायत, मुस्लिम और अचुतों के लिए कितने गुना आरक्षण था? इसकी कल्पना करने करने की जरुरत है. मराठे क्षत्रिय नही तो शुद्र है ऐसी सोच ब्राह्मणों की थी पर मराठे खुद को शुद्र मानने के बजाए ‘क्षत्रिय’ मानना पसंद करते थे. शुद्र रहे या क्षत्रिय, दोनों भी ब्राह्मणों के वैदिक चातुर्वर्ण्य के ही अंग है, जिसे अभी हिन्दू धर्म में उनका समावेश होता है, वर्णवादी आन्दोलन आगे जातिवादी बना क्योंकि जाती तोड़ने के लिए साहू महाराज ने प्रयास नही किया.


शाहू महाराज के गुरु फ्रेजर रहे है, जिसने उन्हें पश्चिमी धर्ती की येशु भगवान की ‘ईश्वरवादी’ शिक्षा मिली. ईश्वर ने चातुर्वर्ण व्यवस्था और जाती व्यवस्था बनाई है, उसे तोड़ने का प्रयास ईश्वरविरोधी कार्य होगा, इस डर से उन्होंने न कभी वर्ण व्यवस्था को तोड़ने की कोशिस की थी और न जाती व्यवस्था को तोड़ने के लिए उचित कदम उठाए. जिसका परिणाम यह हुआ की उनके सुधारनावादी धोरण का समाज पर ख़ास कोई असर नहीं गिरा.


हिन्दुधर्म में भारतीय स्थर पर जितनी भी अछूतों की जातिया थी, उसमे पहला मत्रिक पास होनेवाला लड़का महार जाती का था, जो कोल्हापुर इलाखे से नही तो मुंबई इलाखे से था, जिनका नाम भीमराव रामजी अम्बेडकर था. उनका जन्म मध्यप्रदेश के महू में हुआ पर बचपन शाहू महाराज के सांगली, सातारा जिलों में हुआ था, जहाँपर अछूतों के साथ किस ढंग से अनगिनत अत्याचार, भेदभाव चालू थे? इसकी जानकारी भीमराव आंबेडकर के पूर्व जीवनी से ही पता चलती है.


शाहू महाराज के इलाखे में अछूतों के क्या हाल थे? उसे देखते हुए १९२० के मानगाव परिषद में खुद शाहू महाराज ने ही कबूल किए थे. महारो को वतनदारी थी, जिसमे कुछ भी ख़ास फायदा नहीं था, उनसे जबरन काम किया जाता था पर उनके उचित मुहावजे की कोई गारंटी नही थी. गाँव के बाहर गावों की रखवाली करने की जिम्मेवारी उनपर दी गयी थी. भीमराव उर्फ़ बाबासाहब के आग्रह के बाद उसे ख़त्म करने के लिए शाहू महाराज ने अपने अंतिम दिनों के पहले २ सालो में उसका अध्याधेश निकाला था.


मानगाव परिषद के अपने अध्यक्षीय भाषण में शाहू महाराज ने महार जातियों को कहा था, की अछूतों को उनका सही नेता भीमराव अम्बेडकर के रूप में उन्हें मिल चूका है. इसका अर्थ यह हुआ की वे केवल अछूतों के ही नेता है, न की अन्य हिन्दू, अब्राह्मण आन्दोलन के नेता. अगर अब्राहमन आन्दोलन के नेता के रूप में उसे अगर कहा होता तो वे उनके चमार, मराठे, जैन, मुस्लिमो के भी नेता हो सकते थे. पर उससमय के लोगों की जातिवादी सोच शाहू महाराज के दिमाग में ऐसी बैठी थी की केवल ‘क्षत्रिय’ वर्ण ही श्रेष्ट है, न की अतिशूद्र, महार, मांग आदि अछुत जाती, भटके विमुक्त या जंगली जातिया.


शाहू महाराज का ब्राह्म्नेत्तर आन्दोलन जातिवादी ही रहा है. बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने उन्हें अपने मित्र के रूप में माना आदर दिया पर वे अपने ब्राह्मनेतर आन्दोलन में उन्हें न स्वीकार कर सके और न उनके जाने के बाद उनके आदोलन के कार्यकर्ताओ ने बाबासाहब का साथ निभाया. उनके आन्दोलन से समाज में जातिवाद फैला पर नष्ट नही हुआ, अगर सही में उनके आन्दोलन के जरिए जातितोड़ो आन्दोलन किया होता तो जातिविरोध के अम्बेडकरी आन्दोलन में अर्थात धर्मान्तर में महार जातियों के अलावा अन्य जातियों ने भी सहभाग दिया होता.


शाहू महाराज जिस चमार जाती के समझे जाते थे, उन चमार जाती में भी वे यह जाग्रति नही की की जातिवादी सोच को पालना बेवकूफी है. अछूतों में से महार जाती को नीच समझकर उनके साथ, बुद्धिजीवी बाबासाहब के साथ न केवल उच्च वर्णीय, लोगों ने भेदभाव नही किया था तो अछूत समझे जानेवाले मांग, ढोर, चमार जातियों ने भी भेदभाव किया था और अभी भी कर रहे है, जो महारों का बुद्धधम्म समजकर उनके साथ बेटी व्यवहार करने में उत्सुक नहीं है.


चमार का लड़का अगर मराठो ने दत्तक लिए और उन्हें राजा बनाए, तो वे खुद को महान, क्षत्रिय समज रहे है. वर्ण और जाती व्यवस्था को सही समझ रहे है, उसे जाती, वर्ण गर्व, अज्ञान, पुराणपंथी नही कहना चाहिए तो और क्या? उनके स्मारक बनाकर चौराहे पर खड़े किए जाए तो उनसे प्रेरणा क्या मिलेगी? चातुर्वर्ण सही है, ईश्वर ने उसे निर्माण किया है, वेदों के विचार सही है, जातिवाद सही है और उसे तोड़ने के बजाए उच्च जातीयों के द्वेष के लिए निम्न जातियों के लोगों ने जातिवाद को बिना छोड़े अपने ही देश में हिन्दुधर्म में हमेशा संघर्षरत रहे.


केवल अपने राजेशाही को उच्चवर्णीय ब्राह्मणों के हमलों से बचाने के लिए उन्होंने शिक्षा और नोकरियो के लिए कुछ ही हदतक बढावा दिया. जिसका खास फायदा पिछड़े जातियों को नही हुआ. जैन भी ठीक, मुस्लिम भी ठीक, हिन्दू भी ठीक, लिंगायत भी ठीक, मराठे भी ठीक ऐसे वे ही लोग कहते है जो सत्ता से हटकर समाज का मुल्यमापन नही करते. अगर लोगों के आचार-विचारों और मन्येताओं में जमीन-असमान का फर्क रहने पर भी उसे ख़त्म करने की पहल करने के लिए उचित पहल करने के बजाए केवल उपरी स्थर पर लिपा-पोथी करने से क्या फायदा?


न कोई व्यक्ति अपने पिछड़े जाति के आधारपर महान होता है और न कोई व्यक्ति अपने अगड़े जाति के आधारपर महान हो सकता. जिनके विचार जनतंत्र के लिए उचित साबित होते है, जनतंत्र को बढ़ाने में सहाय्यक होते है, उन्ही के देश में स्मारक होने चाहिए, अन्यथा जातिवादी, वर्णवादी, वंशवादी लोगों के पुतले, बुत सार्वजनिक क्षेत्र में खड़े करने से देश में जातिगत आतंक और अनाचार फैलेगा जो मानव हितों से विपरीत होगा.


शाहू महाराज धर्म से एक हिन्दू राजा थे, जो हिन्दुधर्म के अंतर्गत अपने को क्षत्रिय वर्ण के अंतर्गत सम्मान की अभिलाषा करते थे पर सामान्य जनता को हिन्दुधर्म के नर्क से आझादी दिलाने के बजाए उसी में फँसाने के लिए उपनयन, आर्य समाज का प्रचार किया करते थे. उनके कार्य में और बाबासाहब अम्बेडकर के कार्य में काफी फर्क रहा है. शाहू महाराज ‘हिन्दुधर्म सुधारक’ रहे है तो भीमराव उर्फ़ बाबासाहब आंबेडकर ‘समाज क्रांतिकारक’ रहे है.


डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर से जातीयवादी ईर्षा करने के उद्धेश से बीएसपी/बामसेफ ने ‘शाहू महाराज के स्मारकों’ को बढ़ावा देने का वर्णवादी, जातिवादी कार्य नही करना चाहिए, जो न देश के जनतंत्र के लिए उचित है और भारतीय गरीब समाज के लिए हितावह है. क्या अब पथ विहीन रेगिस्थान के समान, वैदिक चातुरवर्ण के ईश्वरीय भेदभावी विचारों से जनतंत्र चलना चाहिए?


बाबासाहब भीमराब आंबेडकर के मतानुसार अगर हिन्दू धर्म ही नरक है, तो चातुर्वर्ण्य की वकालत करने से, ऐसा कोनसा स्वर्ग मिलेगा? वर्णवादी वकालत करनेवालबाल गंगाधर तिलक प्रेरणादायी हो सकते, न सरदार वल्लभभाई पटेल प्रेरणादायी हो सकते, न मोहनदास गाँधी प्रेरणादायी हो सकते आर न छत्रपति शाहू महाराज प्रेरणादायी हो सकते. इसे देश के जनतांत्रिक जनता ने गंभीरता से सोचना चाहिएत और उसके बाद ही उसका समर्थन करना चाहिए. यही मेरी जनतांत्रिक भारतीय जनता से गुजारिश है.

बुद्धधम्म और मूर्तिपूजा


बौद्ध लोगों का विनाश ध्यान, समाधी वाली बुद्ध मूर्तियों को फूलमालाए चढ़ावा चंधने से नहीं तो डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के जैसी किताबे पढने से ही होगा. 



भारत मूर्तिपूजा से जबतक मुक्त नहीं होगा, तबतक देश में अंधश्रद्धा फैलते रहेगी. पूजापाठ व्यक्ति के कार्यकुशलता को घटाती है, बढाती नही. चाहे फिर वह किसी भी धर्म या धम्म में हो, उससे मुक्ति पाने में ही जनकल्याण है, पत्थरों को इंसानों से अधिक महत्व देना, उसकी परवरिश करना एक कुपमंडुक प्रकारका कार्य है, जो बौद्ध लोगो में भी पाया जाता है. उसे धम्म नही कहा जा सकता, वह धर्म विचार है, अवैज्ञानिक और तर्कविहीन विचारधारा है. उसका पालन करना न उनके लिए फायदेमंद है और न धम्म प्रचार के लिए प्रेरणादायी है.

बुद्ध धम्म पत्थरों का धम्म विचार नहीं है, वह इंसानों के विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन लानेवाले विचार है. कुछ हिन्दू लोगों ने बुद्ध के विचारों को मात देने के लिए, उनका दिमाग भटकाने के लिए बुद्ध मूर्तियों की निर्मिती की, उनकी विधिवत स्थापना की और उसे पूजन सुरु किया. उससे लोग मूर्तियों में धम्म को खोजने लगे. हिन्दू आर बौद्ध विचारों में क्या फर्क रहा?

हफिज जालंधरी ने सही कहा है, "गल्त समझे यह बुद्धिमान गौतम के बषारत को, बलाए-बुत-प्रस्ती ने किया बर्बाद भारत को."


आतंकी विचारधारा धार्मिक विचारों की उपज है. हिन्दू और मुस्लिम धर्म के धर्म मतों की जाँच होनी चाहिए. धर्म चिकित्सा और उनके मुल्ल्ला/संतों के मतों की चिकिस्ता जबतक नही होती, तबतक कुंठित मनोवृत्ति को नही रोक सकते. यही मनोदशा आगे प्रज्ञासिंग ठाकुर बनाती है तो किसे अजमल कसाब ... धर्म चिकित्सा से ही आतंकी मनोदशा को रोक सकते, सरकारने धर्ममतों में खोज करके गल्त विचारों पर रोख लगानी चाहिए. जो धर्ममत राष्ट्रिय भावनाओ को ख़त्म करने के लिए नुकसानदायी उन्हें निकलकर फेक देना चाहिए. सलमान रश्दी ने "कुरान" पर टिपण्णी की तो वह सही साबित हो रही है. सैतानी कार्यवाही यह छद्म धर्म विचारों की देन है, जो पुरे विश्व के जनतंत्र पर हमला है. भारत के मुस्लिम क्या तोफ है, जिसे डरकर कांग्रेस देश के जनतंत्र के लिए खतरो को देश में पल रही है? धर्मगुरु जीते और राजनेता हार गए...! 



मुल्ला, मौलवी, संत, भन्ते जमीन पर बोझ है... इनका कार्य है की जनता को वैचारिक रूप से लोगों को सुधारे पर वे सब के सब नाकाम साबित होते हुए दिखाई दे रहे है...


आतंकी विचारधारा धार्मिक विचारों की उपज है. हिन्दू और मुस्लिम धर्म के धर्म मतों की जाँच होनी चाहिए. धर्म चिकित्सा और उनके मुल्ल्ला/संतों के मतों की चिकिस्ता जबतक नही होती, तबतक कुंठित मनोवृत्ति को नही रोक सकते. यही मनोदशा आगे प्रज्ञासिंग ठाकुर बनाती है तो किसे अजमल कसाब ... धर्म चिकित्सा से ही आतंकी मनोदशा को रोक सकते, सरकारने धर्ममतों में खोज करके गल्त विचारों पर रोख लगानी चाहिए. जो धर्ममत राष्ट्रिय भावनाओ को ख़त्म करने के लिए नुकसानदायी उन्हें निकलकर फेक देना चाहिए. सलमान रश्दी ने "कुरान" पर टिपण्णी की तो वह सही साबित हो रही है. सैतानी कार्यवाही यह छद्म धर्म विचारों की देन है, जो पुरे विश्व के जनतंत्र पर हमला है. भारत के मुस्लिम क्या तोफ है, जिसे डरकर कांग्रेस देश के जनतंत्र के लिए खतरो को देश में पल रही है? धर्मगुरु जीते और राजनेता हार गए...! 


मुल्ला, मौलवी, संत, भन्ते जमीन पर बोझ है... इनका कार्य है की जनता को वैचारिक रूप से लोगों को सुधारे पर वे सब के सब नाकाम साबित होते हुए दिखाई दे रहे है...
मुल्ला, मौलवी, संत, भन्ते जमीन पर बोझ है.